नेहरू-गांधी परिवार के नाम
Mar 11th, 2010 | By admin | Category: Know About The BSPनेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के नाम पर योजनाओं के नामकरण को अनुचित बता रहे हैं ए सूर्यप्रकाश
मार्च, 2009 को मैंने चुनाव आयोग का ध्यान खींचा था कि केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं का नामकरण कांग्रेस नेताओं के नाम पर करने से कांग्रेस को अनुचित लाभ मिल रहा है। केंद्र सरकार की योजनाओं में से अधिकांश नेहरू-गांधी परिवार के तीन सदस्यों के नाम पर चलाई जा रही हैं। मैंने कहा था कि अगर इस प्रक्रिया को नहीं रोका गया तो इससे कभी भी तमाम पार्टियों को समान अवसर नहीं मिल पाएंगे। मैंने आयोग से अर्ज किया है कि यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार को दिशानिर्देश दिए जाएं सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों का नामकरण राजनीतिक रूप से तटस्थ लोगों के नाम के आधार पर ही किया जाए।
मुख्य चुनाव आयुक्त को लिखे इस पत्र के मुख्य बिंदु और इनमें शामिल कानूनी मुद्दों पर अखबारों में चर्चा हो चुकी है। इस सुझाव की पहली वर्षगांठ पर बड़े खेद के साथ बताना पड़ रहा है कि इस संबंध में मुख्य चुनाव आयोग ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। यद्यपि इस महत्वपूर्ण इकाई के संचालन के लिए सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं, फिर भी महत्वपूर्ण मुद्दे उठाने वाले नागरिकों को जवाब देने में चुनाव आयोग में अनुशासन, लोकतांत्रिक मिजाज और बुनियादी शिष्टाचार की कमी स्पष्ट नजर आती है। मुख्य चुनाव आयुक्त को लिखे पत्र में मुख्य मुद्दे इस प्रकार थे-
पिछले 18 सालों से भी अधिक समय में कांग्रेस तमाम प्रमुख सरकारी कार्यक्रमों, परियोजनाओं और संस्थानों का नामकरण गांधी-नेहरू परिवार के तीन सदस्यों, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर कर रही है। मोटे तौर पर केंद्र और राज्य सरकार की करीब 450 योजनाएं, कार्यक्रम और संस्थान चल रहे हैं, जिनमें लाखों करोड़ रुपए व्यय हो रहे हैं। एक को छोड़कर सामाजिक क्षेत्र की तमाम योजनाएं इन तीन लोगों के नाम पर चल रही हैं। सैकड़ों सरकारी योजनाएं और कार्यक्रम ऐसे हैं जिनमें हजारों करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया है। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतिकरण योजना में 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 28 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान है। इसी प्रकार राजीव गांधी पेयजल अभियान में तीन साल के दौैरान 21 हजार करोड़ रुपए खर्च होने हैं। जवाहरलाल नेहरू अर्बन रिन्यूवल मिशन में अगले सात साल में 50 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाने हैं। इसके अलावा इंदिरा आवास योजना का वार्षिक बजट करीब 8 हजार करोड़ रुपए और इंदिरा गांधी नेशनल ओल्ड ऐज पेंशन स्कीम का 3.4 हजार करोड़ रुपए है। सार्वजनिक योजनाओं से लाभ उठाने के कांग्रेस के लालच की कोई थाह नहीं है। नेशनल क्रेच स्कीम में मात्र 90 करोड़ रुपए सालाना और लघु व अति लघु उद्यमिता के प्रोत्साहन के लिए जारी कार्यक्रम उद्यमी मित्र योजना कुल 1-2 करोड़ रुपए की ही है। ये कार्यक्रम भी राजीव गांधी के नाम पर चलाए जा रहे हैं।
प्रदेश सरकारों में भी गांधी-नेहरू परिवार के इन तीन सदस्यों के नाम पर योजनाओं का नामकरण करने की होड़ लगी है। उदाहरण के लिए, पोंडिचेरी में बच्चे जब भी नाश्ते करते हैं उनसे राजीव गांधी को याद करने की उम्मीद की जाती है, आंध्र प्रदेश में गरीब जब भी स्वास्थ्य योजना के कार्ड का इस्तेमाल करते हैं उन्हें राजीव गांधी को याद करना पड़ता है और इसी प्रदेश के किसानों की बछड़ा खरीदने से पहले इंदिरा गांधी को स्मरण करने की मजबूरी है। हरियाणा में, गरीब महिलाओं को शादी के वक्त इंदिरा गांधी का नाम लेना पड़ता है, क्योंकि इस उपलक्ष्य पर सरकार द्वारा शगुन के नाम पर दी जाने वाली धनराशि उन्हीं के नामकरण पर है। इसी प्रकार की सैकड़ों अन्य योजनाएं हैं, जिनकी सूची छापने के लिए जगह कम पड़ जाएगी। गांधी-नेहरू के नाम पर करीब 450 योजनाओं, कार्यक्रमों, शोधवृत्तियों, संस्थानों और खेल की ट्राफियों की सूची मेरी वेबसाइट एसूर्यप्रकाश.काम पर उपलब्ध है।
मैंने चुनाव आयोग से प्रार्थना की थी कि वह केंद्र सरकार और तमाम राज्य सरकारों को निर्देश दे कि इन याजनाओं के नामों से ऐसे व्यक्तियों के नाम हटाए जाएं, जिन्हें जनता विशिष्ट राजनीतिक दलों के नायकों के रूप में जानती है। मैंने कहा था कि इस प्रकार के निर्देश से आचार संहिता वास्तविक रूप में लागू होना सुनिश्चित हो सकता है। एक तरफ तो आचार संहिता छोटे-मोटे जुर्म जैसे सत्तारूढ़ दल के लोगों द्वारा चुनाव के दौरान सरकारी वाहनों का इस्तेमाल करने के खिलाफ है, वहीं दूसरी तरफ एक परिवार के तीन सदस्यों के नामकरण पर चलने वाली एक लाख करोड़ रुपए से अधिक की योजनाओं से कांग्रेस को लाभ उठाने की छूट दे रखी है।
इसके अलावा मैंने चुनाव आयोग का उसके ही अनेक ऐसे आदेशों की ओर ध्यान खींचा है, जिनसे लगता है कि आयोग चुनावी रणक्षेत्र में साफसुथरे नियमों को लागू करने का इच्छुक है। 2006 में जारी किए गए ऐसे ही निर्देशों में से एक केंद्र और राज्य के मंत्रियों को ऐसे बयान जारी करने से रोकने के संबंध में है, जिनसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के प्रभावित होने का खतरा है और चुनावी रणक्षेत्र में विभिन्न राजनीतिक दलों को प्रदान किए जाने वाले समान धरातल में बाधा पहुंचाता है। अगर महज मंत्रियों की बयानबाजी से राजनीतिक दलों का समान धरातल असमान हो जाता है तो चुनाव आयोग एक पार्टी को यह छूट कैसे दे सकता है कि वह अपने नेताओं के नाम पर योजनाओं का नामकरण करे और हमेशा के लिए इससे राजनीतिक लाभ उठाती रहे।
यद्यपि, मेरे सुझाव पर आयोग ने चुप्पी साध रखी है, फिर भी पिछले साल कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो निर्वाचन प्रक्रिया पर प्रभाव डालती हैं। एक साल पहले मैंने कहा था कि नेहरू-गांधी परिवार के तीन सदस्यों के नाम पर लाखों करोड़ों की योजनाएं चल रही हैं, किंतु महात्मा गांधी के नाम पर एक भी प्रमुख योजना नहीं है। इस पक्षपात छिपाने को उत्सुक सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का नाम महात्मा गांधी के नाम पर कर दिया है। हालांकि नामचारे की रस्मअदायगी के बाद वह फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आई है और वर्ली-बांद्रा सी-लिंक पुल का नामकरण राजीव गांधी के नाम पर कर दिया है। क्योंकि यह पुल इंजीनियरिंग का नायाब नमूना है, इसलिए इसका नामकरण किसी महानतम इंजीनियर जैसे सर एम विश्वेसवरा के नाम पर किया जाना चाहिए था। किंतु लगता है कि कांग्रेस पार्टी और नेहरू-गांधी परिवार से आधुनिक भारत के निर्माताओं के योगदान को सम्मान देने की गुजारिश करके उससे बहुत बड़ी चीज की मांग कर रहे हैं।
एक साल पहले उठाई गई मांग पर चुनाव आयोग की चुप्पी को आप क्या कहेंगे? क्या वास्तव में यह एक जन संस्थान है जो संविधानिक दायित्वों का निर्वाह कर सकता है और स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम है? मैं इसका फैसला पाठकों पर छोड़ता हूं कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की वचनबद्धता पर खरा उतरने में आयोग की चुप्पी के क्या निहितार्थ निकालते हैं।
[ए सूर्यप्रकाश: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]
Reference: Jagran
We are trying hard that in the next 12-13 years, we will give India its first Dalit Prime Minister — man or woman’ -Kanshi Ram (2005).
If we do not become rulers, our problems will remain forever, Kanshi Ram said.