अभी भी भारत का समाज दलितों के प्रति घृणा का भाव ही रखता है
Jul 8th, 2009 | By admin | Category: Know About The BSPयूनिसेफ के सहयोग से दलित आर्थिक आदोलन और नेशनल कैंपेन आन दलित ह्यूमन राइट्स ने मिलकर एक अध्ययन किया है। यह अध्ययन स्कूलों में दलित बच्चों की स्थिति का जायजा लेने के मकसद से किया गया। इसके नतीजे बेहद चौंकाने वाले हैं।
इस रपट से एक बात तो बिल्कुल साफ हो जाती है कि अभी भी भारत का समाज दलितों के प्रति घृणा का भाव ही रखता है। इस रपट में जिन-जिन राच्यों का अध्ययन किया गया, उन सब राच्यों के स्कूली बच्चों के साथ स्कूल में भेदभाव बस इसलिए किया गया, क्योंकि वे दलित थे। इस रपट में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि भेदभाव की वजह से बड़ी संख्या में दलित बच्चे अपने आगे की पढ़ाई बरकरार नहीं रख पाते।
इस रपट को चार राच्यों के 94 स्कूलों की हालत का अध्ययन करके तैयार किया गया है। दलित बच्चों के साथ हुए भेदभाव के उदाहरणों से यह रपट भरी पड़ी है। उन उदाहरणों के जरिए एक खास तरह की मानसिकता में जकड़े समाज को समझा जा सकता है। इस रपट को तैयार करने वाले राजस्थान के एक स्कूल में गए। वहा जाकर उन्होंने पूछा कि किस बच्चे को यहा के शिक्षक अक्सर पीटते हैं और क्यों पीटते हैं? इस सवाल का जवाब तुरंत वहा मौजूद बच्चों ने दिया। यह जवाब ऐसा है, जो खुद को सभ्य कहने वाले समाज का असली चेहरा दिखाता है। बच्चों ने इस सवाल के जवाब में तुरंत एक ऐसे बच्चे की ओर इशारा किया, जो दलित था। उन बच्चों ने यह भी कहा कि दलित होने के नाते वह निशाने पर रहता है।
यह मामला केवल राजस्थान का नहीं है। दूसरे राच्यों में भी इसी तरह की स्थिति है। बिहार का उदाहरण लिया जा सकता है। इस राच्य में दलितों के नाम पर सियासत करने की पुरानी परंपरा रही है। दलितों के रहनुमा होने का राग अलापने वाले लालू प्रसाद यादव ने इस राच्य पर 15 साल तक राज इसी तरह की राजनीति करके किया। अभी इस राच्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। वे भी दलितों के नाम पर सियासत करने से बाज नहीं आते, पर इस राच्य के स्कूलों की हालत यह है कि स्कूल के शिक्षक दलित बच्चों के अभिभावकों से इस बात की शिकायत करते हैं कि उनके बच्चे साफ कपड़े नहीं पहनते और कक्षा में उनके शरीर से बदबू आती है।
बिहार की ही एक दलित छात्रा ने बताया कि शिक्षक हम लोगों यानी दलित बच्चों पर पूरा ध्यान नहीं देते। हमें जमीन पर बैठाया जाता है।
हालात की बदहाली का आलम यह है कि मिड-डे मील में मिलने वाले भोजन में भी दलित छात्रों के साथ भेदभाव बरता जा रहा है। उन्हें जो खाना मिल रहा है, उसकी गुणवत्ता सही नहीं होती है। इसके अलावा दलित बच्चों को भरपेट भोजन भी मिड-डे मील योजना के तहत नहीं मिल रहा है। इस तरह की शिकायत कई बच्चों ने की।
बिहार के दलित बच्चों ने यह भी शिकायत की कि उन्हें कक्षा में सबसे पीछे बैठने को कहा जाता है। इसके अलावा शिक्षक उनका होमवर्क भी नहीं जाचते हैं।
दलित बच्चों के साथ स्कूली स्तर पर हो रहे भेदभाव की रपट तैयार करने वाले जब उत्तर प्रदेश गए तो वहा के बच्चों ने कई तरह की शिकायतें कीं। दलित बच्चों ने बताया कि उन्हें स्कूल के शौचालय का इस्तेमाल करने से रोका जाता है। उत्तर प्रदेश में दलित बच्चों को कई ऐसे काम दिए जाते हैं, जिसके बारे में यह माना जाता है कि उसे कुछ खास जाति के लोग ही कर सकते हैं।
इसके अलावा इस रपट में बताया गया है कि उत्तर प्रदेश के कई स्कूलों में बच्चों से सिर्फ दलित होने के कारण स्कूल परिसर की सफाई करवाने और पानी भरवाने का काम करवाया जा रहा है।
स्कूलों में दलित बच्चों के साथ भेदभाव के कई दुष्परिणाम स्वाभाविक तौर पर सामने आते हैं। जब इन बच्चों के प्रति शिक्षकों का रवैया ही भेदभावपूर्ण रहेगा तो स्वाभाविक है कि उस स्कूल के गैर-दलित बच्चों के मन में भी दलित बच्चों के प्रति एक खास तरह का पूर्वाग्रह पैदा होगा। वहीं दूसरी तरफ दलित बच्चे हीनभावना से ग्रस्त होते जाएंगे। ऐसा हो भी रहा है। इसका परिणाम बड़ा भयानक हो रहा है।
पहली बात तो यह कि भेदभाव की वजह से शुरुआत से ही दलित बच्चों को अवसरों की असमानता की समस्या से जूझना पड़ता है। आगे चलकर यही उन्हें शिक्षा से बाहर कर देता है। जो किसी तरह अपनी शिक्षा बरकरार रख भी पाते हैं, उनके मन में भी तमाम नकारात्मक बातें घर कर जाती हैं।
खैर, इस रपट में यह भी बताया गया है कि ज्यादातर स्कूल वैसी जगहों पर हैं, जो उच्च जाति के लोगों के दबदबे वाला क्षेत्र है। बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में खास तौर पर ऐसी स्थिति है। इस रपट में यह अनुमान लगाया गया है कि दलित बच्चों को स्कूल तक पहुंचने के लिए औसतन आधे घटे का सफर करना पड़ता है।
महाराष्ट्र में दलित बच्चों को स्कूल तक पहुंचने के लिए बहुत ज्यादा सफर नहीं करना पड़ता है। पर यहा भी ज्यादातर स्कूल उन्हीं क्षेत्रों में हैं, जहा उच्च जाति वालों का दबदबा है।
दरअसल, स्कूलों में भेदभाव होना कई तरह के सवाल खडे़ करता है। पहली बात तो यह कि अगर स्कूलों में भेदभाव हो रहा है तो कहीं न कहीं शिक्षा व्यवस्था में कोई गंभीर खामी है। अपने यहा स्कूलों को विद्या का मंदिर माने जाने की परंपरा रही है। पर सही मायने में वैसे जगह को मंदिर कहना सही होगा क्या, जहा सिर्फ किसी खास जाति में पैदा होने के आधार पर भेदभाव हो?
वहीं दूसरी तरफ शिक्षकों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। भारत में तो शिक्षकों को बेहद सम्मान दिया जाता रहा है। पर अगर उनका बर्ताव बच्चों में भेदभाव वाला हो तो यह बेहद चिंताजनक है। शिक्षक की नजर में स्कूल में पढ़ने वाला हर बच्चा समान होना चाहिए। तब ही वह सही ढंग से अपने दायित्व का निर्वहन कर पाएगा। पर अगर उसका रवैया ही भेदभाव वाला हो तो जाहिर है कि वह समाज के साथ अन्याय कर रहा है। स्कूली शिक्षा के दौरान बच्चों के मन में जो बीज पड़ते हैं, उसका असर उनकी पूरी जिंदगी पर होता है। इसलिए भेदभाव को खत्म करने की शुरुआत तो इसी स्तर से होनी चाहिए और इसमें शिक्षकों की बड़ी अहम भूमिका है।
Reference: jagran.com
Discrimination in the basic schools or education by teachers themselves has been a distinct feature of our subcontinent since the evidence of Eklavya. It cannot be removed until or unless the teachers of Dalit community should be appointed more and more to the teaching posts. Teachers do play important role in improving the social environment prevelant now. All teachers should go through a psychoanalysis test before given an appointment. This may be checked whether the candidate is prejudiced or not and should only be appointed if found suitable. Any person who is demoral or suffering from personality defects that may be hazardous to the society should not be appointed to the teaching posts at any level of education.