कठघरे में सिर्फ मायावती सरकार क्यों?
Sep 17th, 2009 | By admin | Category: Know About The BSPहाल में सुप्रीम कोर्ट ने मायावती सरकार को यह कहकर फटकार लगाई है कि वह यूपी में सात जगहों पर अपनी पार्टी के नेताओं और नायकों के स्मारकों के निर्माण के मामले में अदालत के आदेशों का उल्लंघन कर रही है। कोर्ट ने इन पर हो रहे खर्च की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए सभी स्मारकों का निर्माण कार्य अविलंब रोकने को कहा था। अदालत की मुख्य आपत्ति इस बात को लेकर है कि इन स्मारकों में मायावती समेत बीएसपी और दलित समाज के नेताओं की मूर्तियां लगाने के काम में करीब 2600 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जोकि असल में जनता के धन की बर्बादी है। एक ऐसे वक्त में जबकि यूपी को सूखे का सामना करना पड़ रहा है, राज्य की कानून-व्यवस्था ठीक नहीं है और प्रदेश की माली हालत भी जर्जर है, स्मारकों पर इतनी भारी धनराशि व्यय होना कहीं से भी उचित नहीं जान पड़ता। जहां तक मूर्तियों, स्मारकों और अन्य प्रतीकों की स्थापना की बात है, तो सत्ता में पहुंचे विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने-अपने नेताओं की याद में ऐसे कई काम किए हैं। इन पार्टियों ने अपने वोट बैंक का खयाल करते हुए हर प्रभावशाली तबके-समुदाय से जुड़ी विभूतियों की मूर्तियां और स्मारक भी बड़े पैमाने पर बनाए हैं। अब से पहले स्मारकों, मूर्तियों आदि के निर्माण पर कभी ज्यादा ऐतराज नहीं देखने को मिला है। अलबत्ता यह जरूर हुआ है कि जब भी किसी समुदाय के सम्मानित नेता की मूर्ति को द्वेषवश नुकसान पहुंचाने की कोशिश हुई, तो उससे तनाव फैला है।
मायावती सरकार जिन स्थानों पर मूर्तियां या स्मारक बनवा रही है, ज्यादातर वे जगहें नए बनाए या विकसित किए जा रहे पार्कों का हिस्सा हैं। लखनऊ और नोएडा में विशालकाय पार्कों के एक हिस्से में प्लैटफॉर्म बनाकर उन पर मूर्तियां लगाई जा रही हैं। इन पार्कों का इस्तेमाल आम जन टहलने आदि के लिए करते रह सकते हैं। देश के दूसरे हिस्सों में भी कई एयरपोर्ट, स्टेडियम और सड़कें ऐसी हैं, जिनका नामकरण सत्तारूढ़ दलों द्वारा राजनीतिक उद्देश्य से ही किया गया है। सवाल उठता है कि जब पहले कभी इस पर आपत्ति नहीं जताई गई, तो आंबेडकर पार्कों और दलित नेताओं की मूर्तियों की स्थापना पर ही इतनी हायतौबा क्यों मचाई जा रही है? आंबेडकर पार्क भी जनता के उपयोग के लिए ही बन रहे हैं।
इसी से जुड़ा दूसरा सवाल यह है कि क्या पहले ऐसे सभी निर्माण कामों पर सार्वजनिक धन की बजाय पार्टी फंड खर्च किया गया है? महाराष्ट्र सरकार अरब सागर में 350 करोड़ रुपये के खर्च से छत्रपति शिवाजी की जो प्रतिमा लगाने जा रही है, क्या उसका पैसा पार्टी फंड से आएगा? क्या उसका मकसद सत्तारूढ़ दल की ओर एक नए वोट बैंक को अपनी तरफ आकर्षित करने का नहीं है?
यह भी जरूरी नहीं है कि इस तरह के सभी स्मारक सार्वजनिक उपयोग की अनिवार्यता के साथ बनाए जाते रहे हों। दिल्ली में अनेक नेताओं के नाम पर न्यास या ट्रस्ट बने हैं, जिनके लिए सरकार ने बेशकीमती जमीनें मुफ्त या सस्ते में आवंटित की हैं, उनका इसके अलावा और क्या मकसद है कि वे एक व्यक्ति, विचारधारा और पार्टी के प्रचार का जरिया हैं?
यहां कुछ महत्वपूर्ण सवाल खड़े होते हैं। जैसे यह कि क्या इसकी कोई स्पष्ट नीति है कि स्मारक आदि के निर्माण के लिए सरकारी जमीन किसे दी जाए और किसे नहीं? अगर स्वाधीनता आंदोलन में योगदान के आधार पर किसी विभूति के स्मारक और पार्क के लिए जमीन दी जा सकती है, तो मायावती को संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर पार्क बनवाने का हक क्यों नहीं मिल सकता? अगर एक पार्टी अपने बड़े नेता, पूर्व प्रधानमंत्री या पूर्व मुख्यमंत्री की स्मृति में दिल्ली में कोई यादगार स्थापित करवा सकती है, तो बीएसपी की सरकार भी अपने संस्थापक कांशीराम की मूर्तियां यूपी के पार्कों में क्यों नहीं लगवा सकती? अगर इस पर ऐतराज है तो उसे स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर किस सामाजिक योगदान या योग्यता के आधार पर किसी विभूति के नाम पर बनाए जा रहे ट्रस्ट को मुफ्त या रियायती दरों पर जमीन का आवंटन हो सकता है।
दिल्ली में सिर्फ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि को छोड़कर विशाल क्षेत्रफल वाली अन्य कई नेताओं की समाधियों पर असरदार लोग वर्ष में एक-दो बार ही नमन करते पहुंचते हैं। क्या राजधानी में इन जगहों पर कुछ जनोपयोगी निर्माण नहीं हो सकते थे? ये जमीनें बेहद कीमती हैं, लेकिन इनकी कीमत को लेकर न तो सरकार को कभी कोई चिंता हुई, न कोई बड़ा जनांदोलन इस संबंध में चलाया गया, न ही कोर्ट ने कभी इसका संज्ञान लिया। क्या कभी यह तर्क दिया गया कि जहां लाखों लोग मलिन बस्तियों में जीवन बसर करने को बाध्य हैं, वहां ऐसी विशाल समाधियां बनानेके पीछे नैतिक और संवैधानिक आधार क्या है।
यही नहीं, देश में ऐसे भी कई वाकये हुए हैं जब किसी देवता-पीर आदि के नाम पर रातोंरात सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया गया। जमीन वापस लेना तो दूर, समुदायों के दबाव में प्रशासन किसी निर्माणाधीन सड़क के बीच में पड़ने वाले उन कथित पूजा स्थलों को हटवाने की हिम्मत तक नहीं कर सका। बेहद पॉश इलाकों में पड़ने में वाले ऐसे पूजा स्थलों पर, जो किसी सार्वजनिक कार्य या निर्माण में बाधा बने हुए हैं, कोर्ट को नोटिस क्यों नहीं लेना चाहिए?
जो सवाल मायावती सरकार द्वारा कराए जा रहे निर्माण कामों को लेकर उठ रहे हैं, उन्हें अन्य सरकारों के ठीक ऐसे ही निर्माणों पर भी उठाया जाना चाहिए। जमीन के आवंटन और मूर्तियों-स्मारकों के निर्माण पर होने वाले खर्च की संवैधानिक वैधता की पड़ताल अगर यूपी सरकार के संदर्भ में जरूरी है, तो यह जरूरत उन सभी ट्रस्टों, स्मारकों और पार्कों के संबंध में भी कतई कम नहीं है, जिन्हें रियायती या मुफ्त जमीनें दी गई हैं और जिन पर असल में जनता का ही पैसा खर्च हुआ है। अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो कल मायावती सरकार को यह कहने का अधिकार होगा कि आंबेडकर पार्कों और उनके नेताओं के स्मारकों पर रोक सिर्फ इसलिए लगाई गई, क्योंकि उनका ताल्लुक देश के दलितों से था।
Media is the responsible for that, All the media sources which are controlled by Hindus, worked against this issue. They never want, that our party get progress.
nothing besides all these things congress party is responsible and SP actually these party are scarred after elections …….because day by day our vote bank is increasing so they Are doing these things through different different people…..and accept NDTV all media are responsible …….they want to break our unity chain but they don know how much we becoming strong after viewing these things
Finally at last i want to say one day we will prove what we are….Jai Bhim….!!!