कांग्रेस खा गई शक्कर पी गई तेल |

Jan 12th, 2010 | By admin | Category: Know About The BSP

मनमोहन सिंह इंदिरा गांधी सरीखे नहीं हैं और हो भी नहीं सकते, लेकिन उनका शासन इंदिरा गांधी के उन दिनों की याद दिला रहा है जब. वह इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा. वाले भाव से ग्रस्त थीं। भूतल परिवहन मंत्रालय राष्ट्रीय राजमार्गो पर जिस तरह हर 25 किलोमीटर पर सोनिया-मनमोहन सिंह के फोटो लगाने की तैयारी कर रहा है उससे इसी की पुष्टि होती है कि इंदिरा इज इंडिया..सरीखे युग की वापसी हो गई है। एक अनुमान के अनुसार राजमार्गो पर सोनिया-मनमोहन सिंह के फोटो लगाने पर 14 से 25 करोड़ रुपये के आसपास धन खर्च होगा। राजमार्ग प्राधिकरण ने सफाई दी है कि सोनिया-मनमोहन के फोटो टांगने पर जो रकम खर्च होगी वह सरकार के खजाने से नहीं, बल्कि सड़क बनाने वाली कंपिनयों द्वारा खर्च की जाएगी। यह तो और भी बुरा काम है। इसका सीधा मतलब है कि इन कंपनियों पर इसके लिए दबाव बनाया गया है कि वे अपनी जेब से पैसे खर्च कर सोनिया-मनमोहन के फोटो राजमार्गो पर सजाएं। इससे यह कहीं अच्छे से पता चल रहा है कि आम आदमी के साथ का दम भरने वाली सरकार के पास इस तबके की चिंता करने की भी फुर्सत नहीं रह गई है-और वह भी तब जब चीनी 50 और दालें 100 रुपये किलो बिक रही हैं। जाहिर है कि यदि मौजूदा हालात में खा गई शक्कर पी गई तेल, यह देखो कांग्रेस का खेल.. जैसे नारे लगाए जाएं तो अनुचित न होगा। यदि गृहमंत्री पी चिदंबरम और मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को छोड़ दिया जाए तो यह जानना कठिन है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत उनके शेष मंत्री क्या कर रहे हैं? इस सवाल का जवाब तब नहीं मिल रहा जब मनमोहन सिंह को इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं कि झारखंड में कांग्रेस सरकार क्यों नहीं बना सकी अथवा जगनमोहन रेड्डी पर लगाम कैसे लगाई जाए?

समस्या यह है कि आर्थिक विकास दर से रीझे चंद बुद्धिजीवियों द्वारा देश में ऐसा माहौल बना दिया गया है कि मनमोहन जैसी मन मोहने वाली सरकार का कोई जोड़ नहीं। चूंकि विपक्ष बिखराव से ग्रस्त है और संप्रग सरकार की आलोचना करना वर्जित कृत्य करार दिया गया है इसलिए कोई भी इस ओर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं कि विदेश नीति से लेकर अर्थनीति तक के प्रत्येक मोर्चे पर केंद्रीय सत्ता कितनी विफल है। महंगाई चरम सीमा को छूने के बाद भी जिस तरह थमने का नाम नहीं ले रही उससे केंद्रीय सत्ता को चिंतित होना चाहिए, लेकिन ऐसे संकेत तक नहीं नजर आते कि उसके लिए यह चिंताजनक मसला है। दालों, चीनी एवं अन्य खाद्य सामग्री के बेतहाशा बढ़ते मूल्यों के लिए उसके पास न केवल तरह-तरह के बहाने मौजूद हैं, बल्कि यह दो टूक जवाब भी कि महंगाई का सामना करने के अलावा और कोई उपाय नहीं।

खाद्य पदार्थो की कमी के लिए कभी कम उत्पादन को जिम्मेदार बनाया जाता है, कभी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी को और कभी राज्य सरकारों के उस रवैये को जिसके तहत जमाखोरों और कालाबाजारियों के खिलाफ कार्रवाई करने में आनाकानी की जा रही है। यदि महंगाई का कारण जमाखोरी है तो फिर कम पैदावार और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी का रोना क्यों रोया जाता है? सवाल यह भी है कि यदि महंगाई के लिए ये सभी कारक जिम्मेदार हैं तो फिर केंद्रीय सत्ता किस मर्ज की दवा है? यथार्थ यह है कि केंद्रीय सत्ता इतनी नाकारा है कि वह न तो कम पैदावार का अनुमान लगा सकी, न समय रहते दालों-चीनी आदि का आयात कर सकी। कहने को एक कृषि एवं खाद्य मंत्रालय है, लेकिन उसे न तो कृषि से मतलब है और न ही खाद्य संकट की चिंता करने से। देश यह भी महसूस कर रहा है कि मनमोहन का शरद पवार पर कोई जोर नहीं और शरद पवार को मनमोहन सिंह की कोई परवाह नहीं। शरद पवार जितने निरंकुश हैं, मनमोहन सिंह अपने निरंकुश मंत्रियों पर लगाम लगाने में उतने ही अक्षम हैं। वह किसी सेमिनार, सभा, सम्मेलन में भाषण देने के लिए ही अधिक स्वतंत्र-सक्षम नजर आते हैं। कोई नहीं जानता-शायद मनमोहन सिंह भी नहीं कि उन समस्याओं से निपटने के लिए क्या किया जा रहा है जो राष्ट्र के समक्ष मुंह बाए खड़ी हैं। चीन, पाकिस्तान तो दूर रहा, नेपाल और श्रीलंका तक पर भारत सरकार दबाव बनाने में अक्षम है। श्रीलंका में लाखों तमिलों के साथ भेड़-बकरियों की तरह व्यवहार किया जा रहा है, लेकिन प्रवासी सम्मेलन में उनकी चर्चा तक नहीं की गई। इसमें संदेह नहीं कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मनमोहन सिंह की विद्वता-विनम्रता का उल्लेख होता है, लेकिन लाख टके का सवाल है कि इससे भारत की जनता को हासिल क्या हो रहा है? मनमोहन सिंह सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में सौ दिन के एजेंडे की घोषणा करने और फिर उसकी कामयाबी का ढिंढोरा पीटने के बाद ऐसा कुछ भी नहीं किया कि उसे सक्षम, सक्रिय और संवेदनशील सरकार के खांचे में फिट किया जा सके।

यदि संप्रग सरकार का शेष कार्यकाल वैसे ही चलना है जैसे अब तक चला है तो उससे देश का मोह भंग होना तो तय है ही, देश का गंभीर समस्याओं से घिरना भी सुनिश्चित है और इसकी बानगी तेलंगाना मुद्दे पर केंद्र सरकार की गफलत से मिलती है। इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने वाली ताकतों के सामने मनमोहन सरकार असहाय ही अधिक है। मनमोहन सरकार एक सूरत में ही सही तरह चल सकती है जब आंतरिक सुरक्षा के समक्ष उत्पन्न चुनौतियां समाप्त हो जाएं, देश को नुकसान पहुंचाने वाली बाहरी ताकतें शांत हो जाएं, मानसून मेहरबानी दिखाता रहे और न्यायपालिका अपनी समस्याओं का समाधान खोजने में सफल हो जाए। दुर्भाग्य से ऐसा कुछ होने के आसार दूर-दूर तक नहीं हैं और आम चुनाव आने में अभी चार वर्ष से अधिक का समय शेष है। क्या तब तक ऐसे ही चलेगा? इस सवाल पर विपक्ष विचार करे या न करे, आम जनता को अवश्य करना चाहिए।
Reference: Jagran
[राजीव सचान : लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं]

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