दलित आंदोलन की दिशा
Sep 2nd, 2009 | By admin | Category: Know About The BSPपिछले पखवाड़े स्वतंत्र दलित राजनीतिक आंदोलन में दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं। यह चौंकाने वाली बात है कि सूचना क्रांति के इस दौर में ये दोनों घटनाएं मीडिया में इतनी प्रमुखता हासिल नहीं कर पाई, जितनी कि इन्हें मिलनी चाहिए थी। पहली घटना उत्तर प्रदेश से है, जहां बहुजन समाज पार्टी ने विधानसभा उपचुनाव में चार में से तीन सीटें जीतीं। इस चुनाव का महत्व यह है कि इसने उन आलोचकों का मुंह बंद कर दिया है, जो 2009 के आम चुनाव के बाद मुखर हो गए थे। इसने उन बुद्धिजीवियों के सामने भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जो बसपा नेतृत्व को अवांछित सलाह दे रहे थे। दूसरी तरफ, उपचुनाव में मिली यह जीत उन चुनाव विश्लेषकों व बुद्धिजीवियों को आत्ममंथन करने को मजबूर कर रही है, जो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पुनरुत्थान की घोषणा कर रहे थे।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस उम्मीदवार चार में से तीन सीटों पर अपनी जमानत गंवा बैठे। 2009 के आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की जीत को मीडिया ने जितना उछाला था, अब उसे कांग्रेस की हार का भी उसी अनुपात में विश्लेषण करना चाहिए था। क्या मीडिया और चुनाव विश्लेषकों की यह अवहेलना नैतिक और पेशेवर रूप से सही है? दूसरी घटना महाराष्ट्र से है। वहां रिपब्लिक पार्टी आफ इंडिया के कुछ घटक दल दलितों का नेतृत्व करते हैं। ये दल नया प्रयोग करने की तैयारी कर रहे हैं। कांग्रेस के साथ मिलकर चलने और उससे धोखा खाने के बाद अब ये रिपब्लिक लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के नाम से नया मोर्चा बना रहे हैं। माकपा, सपा से लेकर सत्यशोधक कम्युनिस्ट पार्टी समेत इसमें करीब 14 राजनीतिक दल शामिल हैं। यह दिलचस्प है कि बहुजन समाज पार्टी और प्रकाश अंबेडकर की भारतीय रिपब्लिकन पार्टी इस मोर्चे में शामिल नहीं हुए। इस पहल पर भी मीडिया खामोश है। स्मरणीय है कि भारत में पहला स्वतंत्र दलित राजनीतिक आंदोलन बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने ही शुरू किया था, जब उन्होंने 1936 में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का गठन किया और 1937 में चुनाव मैदान में उतरे। बाद में 1942 में उन्होंने शेड्यूल्ड कास्ट फेडेरेशन का गठन किया था और अंतत: रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया बनाई।
हम सब जानते हैं कि अक्टूबर 1956 में बाबा साहब बुद्ध की शरण में चले गए थे, जिसे उन्होंने अपना मूल पंथ बताया था। ऐसा करके उन्होंने महाराष्ट्र में एक और आंदोलन खड़ा कर दिया। आरपीआई 1957 में अस्तित्व में आई। कुछ समय तक आरपीआई ने बाबा साहब के आंदोलन को आगे बढ़ाने का भरसक प्रयास किया। हालांकि आंतरिक और बाह्यं कारणों से पार्टी टूट गई। आरपीआई के नेतृत्व को अपने दल में शामिल करके कांग्रेस ने इसकी टूट में अहम भूमिका निभाई। कुछ समय तक महाराष्ट्र में दलित आंदोलन ठहर-सा गया। इसके बाद दलित साहित्य आंदोलन उभरा, जिसने दलित राजनीतिक आंदोलन में ईधन का काम किया। दलित साहित्य से प्रेरित होकर आरपीआई की मृत्युशैया पर दलित युवाओं ने दलित पैंथर पार्टी का गठन किया। अमेरिका की ब्लैक पैंथर पार्टी की तर्ज पर 1972 तक दलित पैंथर पार्टी ने दलित और आदिवासी युवाओं के आक्रोश को अभिव्यक्ति दी।
जल्द ही आरपीआई और दलित पैंथर्स में भी टूटन शुरू हो गई। इस हताशाजनक परिदृश्य में कांशीराम ने अपने कुछ मराठी साथियों के साथ मिलकर 6 दिसंबर, 1978 को बामसेफ का गठन किया। 1984 में बामसेफ ने बहुजन समाज पार्टी को जन्म दिया। आज बहुजन समाज पार्टी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी है और यह उत्तर प्रदेश में चार बार सत्ता में आ चुकी है। इसने स्वतंत्र दलित राजनीतिक आंदोलन को नई दिशा दी है, किंतु महाराष्ट्र के दलित आंदोलन का क्या हश्र हुआ? आज यह बिखरा हुआ है।
कुछ राजनीतिक पंडितों का कहना है कि आरपीआई और दलित पैंथर्स के करीब 42 टुकड़े हो चुके हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र में स्वतंत्र दलित राजनीतिक आंदोलन विफल हो गया है, लेकिन ध्यान रहे कि महाराष्ट्र में स्वतंत्र दलित राजनीतिक आंदोलन की विफलता के बावजूद अन्य सामाजिक आंदोलन जिंदा हैं और ताकत बटोर रहे हैं। यहां प्रबुद्ध और विचारशील मानव संसाधन मौजूद हैं। यहां बहुत विस्फोटक स्थिति है, जो ज्वालामुखी की तरह कभी भी फट सकती है इसलिए देश के राजनीतिक दलित नेतृत्व को महाराष्ट्र दलित आंदोलन की कमान बड़ी सावधानी और समझ-बूझ के साथ संभालनी होगी। महाराष्ट्र में दलितों का शिक्षा-दीक्षा बहुत सुलझे हुए मनीषियों ने की है। इसकी शुरुआत 14वीं सदी में संत कवि चकहमेला ने की थी। बाद में ज्योति बा फुले ने दलितों के लिए अलग से स्कूलों की स्थापना कर दलित आंदोलन को एक नई दिशा दी। इनके शिष्य गोपाल बाबा वालंकर ने अंबेडकर से पहले दलितों को लामबंद करना शुरू किया था। उन्होंने बाबा साहब अंबेडकर के दलित आंदोलन की बुनियाद तैयार की।
1919 के बाद बाबा साहब अंबेडकर ने दलितों को सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक और पंथिक मामलों में दलितों का प्रशिक्षण शुरू किया। अंतत: उन्होंने दलितों को संवैधानिक प्रावधानों से सशक्त किया। इन परिस्थितियों में महाराष्ट्र के स्वतंत्र दलित राजनीतिक आंदोलन को उत्तर प्रदेश में बसपा से कुछ सबक सीखने चाहिए। दलित राजनीतिक उत्कर्ष का कोई शार्टकट नहीं है। क्या महाराष्ट्र में कुल आबादी के 10.2 प्रतिशत और 59 जातियों में बंटे हुए दलित एक विचारधारात्मक और संगठनात्मक छतरी के तले लामबंद हो सकते हैं। अगर वे ऐसा करना चाहते हैं तो उन्हें संकीर्ण निहित स्वार्र्थो की केंचुल उतार फेंकनी होगी। अन्यथा देश की स्वतंत्रता के 62 साल बीतने के बाद भी दलित परतंत्र बने रहेंगे। गैर दलित उनका प्रतिनिधित्व करते रहेंगे और उनके लिए कानून बनाते रहेंगे। इस प्रक्रिया में दलित एक विषय से ऊपर उठकर नागरिक कभी नहीं बन पाएंगे।
[विवेक कुमार: लेखक जेएनयू में प्राध्यापक हैं]
Reference jagran.com
WHY EVERYBODY IS SO MUCH CONCERNED ABOUT PARKS & STATUES CONSTRUCTED BY MAYA GOVT. I FEEL THIS IS A POLITICAL PLAN TO HARRASH U.P. GOVT. & DESTABLIZE B.S.P. B.S.P CAN VERY WELL RAISE THIS POINT IN UPCOMING ELECTIONS IN HARYANA & MAHARASHTRA.
Our ultimate goal is to become the governing class to rule this country”. Go and write this goal on the walls of your houses so that every day you will remember it.
– Dr B R Ambedkar
Prime Motive- We are the 85% of total population of India, But split ed into 6000 sub-castes. Our first step is to emerge them under one roof. Now days every religions are becoming stronger and do not want lose their identity. That why all these things are happening. Despite of our huge population, we are still far away from our destination, but we will find the way. We do not have any concern with others but they are doing. There are 3 things must, be Educated, associated and motivated. In last 10 years we attained considerable achievement to organized our community and we are Moving Ahead.
Dalit Movement- It is right that we are stronger in UP, But other states we are little weaker in last few years. For instance,In Punjab, besides the huge potential of rise for our party, but there are our vote bank do not increasing, I think there might be many reasons, there are not any influenced person who can unite and motivate our people. Current situation in punjab is favorable for us. Because other parties’s leaders are fighting with each other for the chair. It is right time to bring back our old allies. We should try to approach them, clear any misunderstandings and concentrate on our target. I hope our party will rethink on it. Definetly Future is Our.
Many Gandhies came and gone but never succeeded to disintegrate our group
dalits have been marginalised due to politics by congress. todays even the stock exchanges are not named after our constitution maker the stock exchanges should be named as Babasaheb ambedkar stock exchange and bombay stock exchange should be renamed and reservation should be there for brokers getting license.atleast 50% of license should be reserved for broking license .not only broking license,but license on mining,government contracts should be for them reserved.then only empowerment can be done.
We need Kashiramji’s attitude to make Dalit movement a success. We are betrayed by false leaders who are responsible for our present condition.