राहुल गाधी के करिश्मे की हकीकत
Jul 5th, 2009 | By admin | Category: Know About The BSPअब जब सौ दिन के एजेंडे के साथ संप्रग सरकार अपनी दूसरी पारी की जोरदार शुरुआत कर चुकी है और मीडिया में राहुल गाधी के जादू और करिश्मे का कोलाहल भी थोड़ा कम होने लगा है तो अब वक्त आ गया है कि 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में राहुल गाधी के जादू और करिश्मे की थ्योरी को कसौटी पर कसा जाए। काग्रेस के रणनीतिकारों की तरफ से लगातार इस बात को प्रचारित-प्रसारित किया गया कि काग्रेस को मिली सफलता के पीछे राहुल गाधी के करिश्मे और उनके व्यक्तित्व के जादू का हाथ है। उत्तर प्रदेश में पार्टी को मिली सफलता का श्रेय भी राहुल गाधी की रणनीति को दिया गया, लेकिन अगर हम इस राज्य में काग्रेस की चुनावी रणनीति और राहुल गाधी के तथाकथित होमवर्क की गहराई से पड़ताल करें तो राहुल की रणनीति के साथ-साथ उनके करिश्मे का मुलम्मा भी उतर जाता है।
सबसे पहले रायबरेली और अमेठी को ही लें। रायबरेली और सुल्तानपुर दो जिले हैं, जिनमें तीन लोकसभा क्षेत्र आते हैं। यह सर्वविदित तथ्य था कि अमेठी से स्वयं राहुल और रायबरेली से सोनिया गाधी चुनाव लड़ेंगी, लेकिन इसी जिले की तीसरी लोकसभा क्षेत्र सुल्तानपुर से कौन चुनाव लड़ेगा, इसका फैसला अंतिम समय तक नहीं हो पाया था। ये कैसी रणनीति थी या फिर कैसा होमवर्क था जिसमें सूत्रधार अपने ही गृहजिले के उम्मीदवार तय करने में दुविधा का शिकार था। अगर होमवर्क किया गया होता तो न तो ये दुविधा की स्थिति होती और न ही मामला आखिरी वक्त तक लटकता। अब एक और नमूना देखते हैं। सूबे की राजधानी लखनऊ की प्रतिष्ठित सीट को लेकर भी काग्रेस के पास कोई योजना नहीं दिखाई दी। इस सीट पर सबसे पहले सपा ने फिल्म अभिनेता संजय दत्त की उम्मीदवारी का ऐलान कर सबको चौंका दिया। सुप्रीम कोर्ट से इजाजत नहीं मिलने की वजह से संजय दत्त चुनाव नहीं लड़ सके। इसके बाद भाजपा और बसपा के उम्मीदवारों का भी ऐलान हो गया, लेकिन सूबे में अपनी खोई जमीन की तलाश में लगी काग्रेस को कोई उम्मीदवार नहीं मिल पा रहा था। सपा ने नफीसा अली को लखनऊ से अपना उम्मीदवार बनाकर काग्रेस को तगड़ा झटका दिया। बेहतर चुनावी रणनीति और राहुल गाधी के होमवर्क की बात करने वाली पार्टी को उस वक्त लखनऊ जैसी प्रतिष्ठित सीट के लिए कोई उम्मीदवार नहीं सूझ रहा था। जब कोई विकल्प नहीं मिला तो पार्टी ने अपने प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी को ही अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस अफरातफरी से राहुल गाधी की तथाकथित रणनीति और फार्वर्ड प्लानिंग के दावों की हवा निकल गई। मुरादाबाद में भी काग्रेस की लचर प्लानिंग दिखाई देती है। इस सीट पर भी जब काग्रेस को कोई उम्मीदवार नहीं मिला तो परू्व क्रिकेटर अजहरुद्दीन को आनन-फानन में यहा से टिकट दे दिया गया। अजहरुद्दीन वही क्रिकेट खिलाड़ी हैं जिन पर मैच फिक्सिंग के मामले में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने आजीवन प्रतिबंध लगाया हुआ है। यह दीगर बात है कि जातिगत समीकरणों और ग्लैमर के सहारे अजहरुद्दीन चुनाव जीत गए। यह तो तीन सीटों की बानगी है, उत्तर प्रदेश में इनकेअलावा भी कई सीटें गिनाई जा सकती हैं, जहा काग्रेस की न तो कोई योजना थी, न ही कोई व्यूह रचना। जीत की वजह कहीं स्थानीय फैक्टर रहा तो कहीं सूबे की राजनीति में चुनाव के वक्त बना गठबंधन रहा, जिसकी वजह से वोट बैंक शिफ्ट हुआ।
अब अगर हम बिहार के चुनावी नतीजों पर नजर डालें तो यहा इस बार पार्टी को एक सीट का नुकसान हुआ। काग्रेसियों का तर्क है कि बिहार में पार्टी के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई है और वोटर राहुल गाधी के करिश्मे की वजह से पार्टी की ओर आकृष्ट हुए हैं, लेकिन अगर आकड़ों पर गौर करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि बिहार में काग्रेस का वोट प्रतिशत इस वजह से बढ़ा है कि पार्टी ने लगभग सभी चालीस सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए। बिहार की ही तरह अगर हम आध्र प्रदेश और गुजरात का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि वहा भी राहुल गाधी का कोई करिश्मा नहीं चला। आध्र प्रदेश में काग्रेस की जीती तैंतीस सीटों में से पच्चीस सीट ऐसी हैं जहा अगर तेलगूदेशम के चार पार्टियों के गठजोड़ और प्रजाराज्यम को मिले वोट जोड़ दिए जाएं तो वह काग्रेस से ज्यादा हैं। इसी तरह गुजरात में नरेंद्र मोदी के अड़ियल रवैये और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करने की वजह से काग्रेस को फायदा हुआ। हमें यह भी नहींभूलना चाहिए कि राजीव गाधी के बाद पहली बार काग्रेस ने अपने प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह के नाम का ऐलान कर दिया था। जाहिर है, मतदाताओं के सामने मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के रूप में मौजूद थे और उन्होंने सभी विकल्प देखकर अपनी पसंद का ऐलान किया।
Reference: jagran.com