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कॉंग्रेसी सोच और दलित

कॉंग्रेसी सोच और दलित

मा.कांशीरामजी जैसे अपने उद्देश को पूरा करने के लिए अगर कोई बहुत ज्यादा समर्पित हो तो क्या हो सकता है यह कल राहुल गांधी के बहनजी पर दिए गए बयान से साबित हो गया। मा.कांशीरामजी के समर्पित आचरण से किए गए कार्य के कारण उत्तर प्रदेश से काँग्रेस का सुपड़ा साफ हो गया और तभी से काँग्रेस कभी भी केंद्र मे बहुमत मे नहीं पहुँच पाई। बहुजन समाज पार्टी के रहते आगे भी केंद्र मे किसी भी एक दल को पूर्ण बहुमत मिलना, खासकर काँग्रेस को, नामुमकिन हो गया है, यह राहुल का असली दर्द है। एक तरह से राहुल गांधी ने बहुजननायक मा.कांशीरामजी के 7 वे स्मृतिदिन पर आदरांजली अर्पित की। राहुल गांधी ने कहा की मायावती ने दलित वोटो पर कब्जा कर रखा है। जब भी दलितो की बात चलती है, पहले मायावती का नाम निकलता है।

दलितो मे केवल एक ही नेता क्यूँ है? दलितो मे लाखो नेता होने चाहिए। अच्छा है की लाफ्टर शो वाले राहुल गांधी के ऐसे बयानो को देखते, सुनते नहीं। वरना वे उसी समय राहुल को अपने शो का मेन एक्टर बना देंगे। जोतिबा फुले, बाबासाहब अंबेडकर से लेकर मायावती तक काँग्रेस का रवैया दलितो के साथ कैसा रहा है यह देश के दलित खूब जानते है। बाबासाहब ने कहा की मेरे जीते जी तो छोड़ो, मेरे मरने के बाद भी काँग्रेस के चवन्नी के सदस्य न बनना, यह बाबासाहब का मार्गदर्शन बाबासाहब के सच्चे अनुयायी भूले नहीं है। काँग्रेस और उसके आकाओ की नजरों मे दलितो का स्थान हमेशा ही निम्न रहा है। काँग्रेस ने हमेशा ही स्वाभिमानी दलित नेतृत्व के खिलाफ एक बिकाऊ नेतृत्व तैयार करने का काम किया, ऐसा बिकाऊ नेतृत्व जो काँग्रेस नेताओ के चौखटो पर कुत्तो की तरह चक्कर काटे। जब कोंग्रेसी कहे तब भौंके, जब कहे तब चुप बैठे, जब कहे तब हड्डी चूसे, जब कहे तब उगल दे…ऐसे पालतू दलित नेतृत्व काँग्रेस को बड़े अच्छे लगते है। केवल दलित ही नहीं, मुस्लिम, सीख, ईसाई….हर एक मजहब मे काँग्रेस ऐसे दलाल पैदा कर छोड़ देती है, दलालो को बढ़ावा देती है, उनके समाज को छोड़ देती है।

मुश्किल यह है की एक कांशीराम ने आकर काँग्रेस का यह सदियो पुराना धन्दा बंद करवा दिया है। जीते जी तो कांशीराम काँग्रेस के लिए मुसीबत बने ही रहे, अपने बाद के लिए मायावती जैसा नेतृत्व तैयार कर उन्होने इस बात का बंदोबस्त भी कर डाला की उनके बाद भी स्वाभिमानी दलित आंदोलन की सम्राट अशोक के भारत जैसा भारत बनने तक धारा अविरत चलती रहे। दलित अब इतने होशियार हो गए है की कौन अपने लिए काम कर रहा है और कौन काँग्रेस के लिए यह अब अच्छे से समझने लगी है। कमसेकम उत्तरप्रदेश मे काँग्रेस को फिर से कभी जमीन नसीब नहीं होगी यह सच्चाई है, चाहे राहुल वहाँ के कितने ही चक्कर लगा ले या कितने ही दलितो के घर जाकर खाना खाने का नाटक करे। राहुल को अपने घर खाना खाने के लिए आता देख वहाँ के दलित मन ही मन मे कोसते है की ‘हाय, पहले इसके पुरखो ने हमे भूखा रखा, अब यह हमारा भी बचा खुचा खा रहा है’। दलितो के घर खाना खाने का नाटक करने वाले राहुल ने कभी किसी दलित को अपने घर मे खाना खिलाने बुलाया हो ऐसा नहीं दिखा। दलित समझने लगा है की सदियो से भूखा रखने वाले काँग्रेस ने अब चुनाव नजदीक देख ‘अन्न सुरक्षा योजना’ का गाजर भारतवासियो को दिखाया है। आजादी के बाद के 66 सालो मे ज़्यादातर समय केवल काँग्रेस की सरकार केंद्र मे रही है और उनमे भी राहुल के पूर्वजो ने बड़ा समय गुजारा है। इतने समय मे अगर यह हमारी जिंदगी केवल खाने के मुद्दे तक ही सीमित रख पाने मे कामयाब हुए है तो क्या खाक आगे हमारी जिंदगी सुधार पाएंगे? एक तरफ दुनिया मे ऐसे भी देश है जो भारत से 100 साल आगे चल रहे है, सोनिया गांधी अपने ईलाज के लिए इन देशो मे जाती है और जिस देश मे राज करती है वहाँ लाखो लोग ईलाज के लिए पैसे ना होने की वजह से हाथ-पाँव घिसते हुए मर जाते है। दलितो मे लाखो नेता होने चाहिए ऐसा कहने वाले राहुल ने अपने गिरेबान ने झांककर नहीं देखा की काँग्रेस मे फिर गांधी परिवार ही सबकुछ क्यूँ है? पी एल पुनिया जैसा बिकाऊ नेता को अपने बगल मे बिठाकर जब ऐसे बयान दे रहे थे तब इतनी हंसी आ रही थी की पूछिए मत। यह वही मतलबी पुनिया है जो कभी कांशीराम साहब के आगेपीछे घूमा करता था, बहनजी की वजह से इसकी राजनैतिक इच्छा पूरी होती नहीं दिखी तो काँग्रेस को बिक गया।

दलितो मे अब ऐसा चलन हो गया है की जो बहुजन समाज पार्टी को छोडकर गया उसे ना समाज मे कोई इज्जत होती है और ना ही राजनीति मे कोई उज्ज्वल भविष्य। काँग्रेस जानबूझकर ऐसे बिकाऊ नेताओ को खुराक खिला पिलाकर बड़ा दिखानेकी कोशिश करती है जबकि बहुजन समाज पार्टी को ऐसे प्रचार प्रसार की जरूरत नहीं होती। बिकाऊ नेताओ की रैली मे पैसे लेकर भी लोग जाने को राजी नहीं होते और बहुजन समाज पार्टी की छोटी छोटी रैलियो को खुद पैसा लगाकर, भूखे पेट रहकर, 2-3 दिन का सफर करके इतना बड़ा बना देते है की काँग्रेस वालो के हाथ-पाँव फूल जाते है। अगर आज दलितो का नाम लेने पर मायावती का ही नाम आता है तो इसके पीछे बड़ी वजह यही है की काँग्रेस ने कभी भी दलितो को निरोध से ज्यादा का दर्जा नहीं दिया। जब जब चुनाव आते है, काँग्रेस को दलितो और मुस्लिमो की याद आती है, चुनाव तक यह दोनों वर्ग काँग्रेस के लिए निरोध का काम करते थे और फिर चुनाव खत्म होते ही काँग्रेस इन्हे दूर फेंक देती थी। दलितो को समझ मे आ गया है बहुमत से सत्ता आनेपर मायावती सत्ता खोने के खतरे को ठुकराते हुए हजारो करोड़ खर्च कर बहुजन महापुरुषों के स्मारक बनवाती है तो काँग्रेस ने इतने सालो मे केवल और केवल जवान लड़कियो के साथ नंगे सोनेवालों बूढ़े और झूठे राष्ट्रपिताओ के स्मारक बनवाए है। यमुना के एक किनारे पर यदि ऐसे नंगे लोगो के स्मारक है जो काँग्रेस ने बनवाए है तो दूसरे किनारे पर मायावती ने भारत के सारे दलितो के लिए दलित प्रेरणा स्थल निर्माण करवाया है।

राहुल गांधी को दूसरा डर यह है की दलित तो काँग्रेस से दूर खिसक ही गए है, कही मुसलमान भी ना खिसक जाए। वैसे भी जबसे दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारीजी ने अगले चुनावो मे बहुजन समाज पार्टी को समर्थन देने की घोषणा की है काँग्रेस, समाजवादी पार्टी और बीजेपी के पैरो तले जमीन खिसक गई है। दलित और मुस्लिम एकता हमेशा ही इस देश के ब्राह्मणवाद के लिए बहुत बड़ा खतरा रही है और देश की सारी मनुवादि पार्टियो के आका इस एकता से बहुत डरते है। बुद्धगया मे किए गए बमविस्फोट इसी एकता को खत्म करने की साजिश के तरह किए गए थे। मुजफ्फरनगर के दंगे भी इसी साजिश के तहत करवाए गए है। बहुजन समाज पार्टी मे हमेशा ही मुस्लिम नेताओ और समाज की तहेदिल से इज्जतअफजाई होती है जिसकी वजह से ढेरो की संख्या मे मुस्लिम नेता आज बसपा मे है। उत्तर प्रदेश छोड़ो, मैंने तो महाराष्ट्र मे भारी तायदाद मे मुस्लिम नेता बसपा मे देखे है और यकीन जानिए, उनके भाषण और विचारो को सुनकर ऐसा कतई नहीं लगता की उनकी अंबेडकरवाद और ब्राह्मणवाद की पढ़ाई मे रत्ती भर भी कमी हो। अब अगर कॉंग्रेस के पास रशीद अल्वी है तो उसे क्यूँ मुस्लिम वोटो की चिंता है, पुनिया है तो क्यूँ दलित वोटो की चिंता है? क्यूंकी काँग्रेस को पता चल गया है की इन दोनों समाज के लोगो को यह समझ मे आ गया है की अपना असली हितैषी कौन है? कौन अपने हको को स्वाभिमान के साथ दिला सकता है? राहुल गांधी, गांधी परिवार और काँग्रेस पर मोदी भारी पड़ते जा रहे है यह सच्चाई है।

मीडिया भी मोदी को बढ़ा चढ़ा रहा है। ऐसे मे बहुत संभावना है की एनडीए और यूपीए की संख्या समान रहे। ऐसे मे अगर बहुजन समाज पार्टी के 50 से ज्यादा सांसद चुनकर आते है तो कोई भी बहनजी को प्रधानमंत्री बनने से रोक नहीं सकता। समाजवादी पार्टी के गुंडई वाले शासन से यह संभावनाए बन चली है की अकेले उत्तर प्रदेश से बसपा के 60 से ज्यादा सांसद चुनकर आएंगे। बसपा के बढ़ते कदमो को रोकने के लिए जैसे बीजेपी ने बहनजी पर सीबीआई का दुरुपयोग कर गलत केस दर्ज करवाया था, आज वही दांव काँग्रेस बीजेपी नेताओ के साथ खेल रही है। बहनजी को इस केस से बरी होना ही था, क्यूंकी इस ‘आय से ज्यादा संपत्ति’ केस मे कुछ दम नहीं था। 2003 मे देशभर के बसपा कार्यकर्ताओ ने करोड़ो रुपये डिमांड ड्राफ्ट के द्वारा बहनजी को भेजे थे जो बहनजी की संपत्ति मे जोड़े गए। जिस महिला ने शादी न की हो, कोई परिवार ना बनाया हो, वह इस संपत्ति का क्या करेगी? स्वाभाविक है, उसे अपनी जिम्मेदारियो का एहसास है और यह पैसा वह काँग्रेस और बीजेपी के पूंजीपतियों के करोड़ो रुपयो का मुक़ाबला करने के लिए ही इस्तेमाल करेगी। ऐसे ही व्यावहारिक तरीको का इस्तेमाल करके मा.कांशीरामजी ने उत्तरप्रदेश को जीता था। उन्ही कांशीरामजी ने अपने जीवन के 25 साल मायावती को परिपूर्ण और समर्पित दलित नेता बनाने के लिए खर्च किए। उनका चुनाव सही साबित हुआ। अब मनुवादियों को यह एहसास हो चला है की चाहे कोई भी तरीका आजमा लो, मायावती ना झुकने वाली है और ना थकने वाली है और ना ही बिकने वाली है।

इस सूरत मे सीबीआई केस जैसे घटिया हथकंडे ही इस्तेमाल किए जा सकते है, जिनका फैसला तो हमारे हक मे आता है लेकिन इसके चक्कर मे बहनजी का वह बहुमूल्य समय जाया होता है जो समय वह संगठन के विस्तार और सशक्तिकरण मे लगा सकती थी। ऐसे हथकंडे अब यही काँग्रेस फिर एक बार बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल करने वाली है। बहनजी को झूठे आरोपो से इतनी तकलीफ हुई तो मोदी और उनके सहयोगीयो का गुजरात दंगो की वजह से क्या होगा सोचिए? जो काम पिछले 4 साल करनेकी सुध काँग्रेस को नहीं रही, चुनावी साल मे वो सारे काम याद आ रहे है। लेकिन लोग काँग्रेस से इतने तंग आ चुके है की गलती से भी काँग्रेस को वोट नहीं करेंगे। राहुल ने मायावती का नाम लेकर टिप्पणी की यह एक तरह से बसपा की नैतिक जीत ही है, क्यूंकी अब तक बीएसपी की सफलताओ को नजरअंदाज कर मार डाला जाता था। अब बीएसपी ने काँग्रेस को इतना मजबूर कर दिया है की आखिर खुद राहुल को बहनजी पर टिप्पणी करनी पड़ी। खैर, जो भी हो, राहुल की टिप्पणी से बसपा कार्यकर्ता बड़े खुश है की एक तरह से राहुल ने अपनी हताशा जाहीर की है की चाहे जीतने भी नाटक, जीतने भी हथकंडे इस्तेमाल कर लो, काँग्रेस का उत्तर प्रदेश मे फिर से खड़े होना नामुमकिन है। राहुल के लिए बुरी खबर यह है की 2014 मे काँग्रेस की यह स्थिति केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, सारे भारत मे होने वाली है। दलितो मे लाखो नेताओ को चाहनेवाले छद्म जनतंत्रवादी राहुल उस परिवार से है जिसने कभी दूसरों को काँग्रेस मे आगे नहीं बढ्ने दिया।

उम्मीद है की अगले साल के बाद जनतंत्र के नाम पर चलनेवाला परिवारवाद अस्तित्व मे नहीं रहेगा और फिर लाखो दलित नेताओ की चिंता राहुल को नहीं करनी पड़ेगी, वह शायद इटली मे अपने नौनिहाल मे भारत के सपने देखा करेंगे। राहुल को यह एहसास नहीं की बसपा एक नेता बनाने वाली फैक्ट्री है जो लाखो नहीं, करोड़ो स्वाभिमानी नेता तैयार करती है। बसपा का हर कार्यकर्ता नेता है होता है क्यूंकी वह कैडर बेस होता है जो अच्छे अच्छे तुर्रमखाँ लोगो को मात देने का माद्दा रखता है। नेतृत्व के संघर्ष मे समाज को भूल जाने की बिकाऊ और अहंकारी नेताओ की परंपरा दलितो ने लंबे समय तक देखी है और इसलिए वह बाबासाहब के एक आंदोलन, एक पार्टी और एक नेता के मार्गदर्शन को ज्यादा अच्छे से समझती है। बहनजी के बाद की चिंता राहुल ना करे, बहुजन समाज पार्टी मे ऐसा नेतृत्व तैयार किया जा रहा है जो बहनजी के बाद भी लंबे समय तक बसपा और अंबेडकरवाद का ज़ोर शोर से प्रतिनिधित्व कर सकेगा, जो न बिकेगा, जो न झुकेगा। मा.कांशीरामजी ने 2001 मे बहनजी को बाकायदा उनका राजनैतिक वारिस घोषित कर दिया था उसके बावजूद पुनिया, अल्वी, बरैया जैसे लोग गद्दार निकले और बहनजी को तकलीफ देने मे कोई कमी नहीं छोड़ी। खुदपर बीती इन घटनाओ ने बहनजी को हर बार और ज्यादा परिपक्व बनाया है और अपने आने वाले वारिस के साथ ऐसा न हो इसकी व्यवस्था करके ही वह अपना वारिस घोषित करेंगी। करोड़ो नेताओ की बसपा को मेरा सलाम और लाखो दलित नेताओ की चिंता व्यक्त करने वाले राहुल के लिए सहानुभूति… जय भीम सचिन म्हैसकर भाईचारा महासचिव वर्धा विधानसभा जिला वर्धा-महाराष्ट्र

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