<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	>

<channel>
	<title>Bahujan Samaj Party</title>
	<atom:link href="http://blog.bspindia.org/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://blog.bspindia.org</link>
	<description>Sarvajan Hitay Sarvajan Sukhay</description>
	<pubDate>Thu, 29 Jul 2010 07:28:17 +0000</pubDate>
	<generator>http://wordpress.org/?v=2.7.1</generator>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
			<item>
		<title>अनाज की बर्बादी पर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी आम आदमी की पीड़ा को व्यक्त करने वाली है</title>
		<link>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80</link>
		<comments>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 29 Jul 2010 07:28:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Know About The BSP]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://blog.bspindia.org/?p=103</guid>
		<description><![CDATA[अनाज की बर्बादी पर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी आम आदमी की पीड़ा को व्यक्त करने वाली है कि अन्न की बर्बादी एक अपराध है। विडंबना यह है कि जिन लोगों पर अन्न की बर्बादी रोकने की जिम्मेदारी है वे ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो। केंद्रीय कृषि एवं खाद्य [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अनाज की बर्बादी पर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी आम आदमी की पीड़ा को व्यक्त करने वाली है कि अन्न की बर्बादी एक अपराध है। विडंबना यह है कि जिन लोगों पर अन्न की बर्बादी रोकने की जिम्मेदारी है वे ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो। केंद्रीय कृषि एवं खाद्य मंत्री शरद पवार ने विगत दिवस लोकसभा में 11 हजार सात सौ टन खाद्यान्न के खराब हो जाने की सूचना इस तरह दी मानों सिर्फ चार बोरी अनाज नष्ट हुआ हो। जिस देश में करोड़ों लोग पेट भर भोजन न कर पाते हों वहां सरकारी गोदामों में हजारों टन अन्न की बर्बादी शर्मसार करने वाली है। ध्यान रहे कि सरकारी गोदामों में अनाज के बर्बाद होने का यह पहला मामला नहीं। पिछले कई वर्षो से यह शर्मनाक सिलसिला कायम है। संप्रग सरकार 2004 से सत्ता में है और खास बात यह है कि तब से कृषि एवं खाद्य मंत्रालय पर शरद पवार ही काबिज हैं। क्या इस काम के लिए छह वर्ष कम होते हैं कि सरकारी गोदामों में रखा जाने वाला अनाज सड़ने न पाए? क्या नाकारेपन का इससे शर्मनाक उदाहरण और कोई होगा? क्या इस पर यकीन कर लिया जाए विशिष्ट व्यक्तियों के दौरे के लिए रातोंरात सड़कें, हेलीपैड वगैरह तो निर्मित हो सकते हैं, लेकिन छह वर्षो में सरकारी गोदामों में ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती कि अन्न खराब न होने पाए? जो देश अन्न का समुचित भंडारण न कर सके और भंडारगृहों में रखे अनाज को साल दर साल सड़ने दे उसे महाशक्ति बनने का दावा करने में शर्म आनी चाहिए। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि कुछ जरूरी कार्यो की जानबूझकर अनदेखी की जाती है। इसमें संदेह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से सरकार के कान पर जूं रेंगेगी, क्योंकि यह कोई ऐसा मामला नहीं जिसमें न्यायपालिका को दखल देने की आवश्यकता पड़ती। जब जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अपने आचरण से यह रेखांकित कर रहे हैं कि उन्हें अनाज सड़ने की परवाह नहीं तब फिर उन्हें उनकी जिम्मेदारी का अहसास करा पाना मुश्किल है। इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि जो सरकार अन्न की बर्बादी रोकने में हद दर्जे की लापरवाही बरत रही है वह खाद्यान्न का आयात करने में आश्चर्यजनक ढंग से तत्परता दिखाती है? क्या ऐसा इसलिए होता है कि इससे कुछ खास लोग बहुत आसानी से लाभान्वित हो जाते हैं? जो भी हो, एक अन्य आघातकारी तथ्य यह है कि कुछ समय पहले जब खाद्यान्न की किल्लत से देश में महंगाई बेलगाम थी तब सरकारी गोदामों में रखा अनाज सड़ रहा था। शरद पवार के इस बयान का कोई मतलब नहीं कि अन्न की बर्बादी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को दंडित किया जाएगा, क्योंकि सब जानते हैं कि दोषी अधिकारियों की पहचान के नाम पर लीपापोती ही होनी है। वैसे भी इस मामले में दंड के सबसे बड़े पात्र तो कृषि मंत्री स्वयं हैं, जो पिछले छह वर्षो से कृषि और खाद्य नीतियों से खेलने में लगे हुए हैं। केंद्रीय सत्ता निर्धन तबके की भलाई के लिए खाद्य सुरक्षा कानून बनाने की आवश्यकता तो समझ रही है, लेकिन पता नहीं क्यों उसे सड़ते हुए अन्न की परवाह नहीं है? यदि अन्न भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं की जा सकी तो खाद्य सुरक्षा कानून के तहत निर्धन वर्ग को मिलने वाला अनाज सड़ा-गला भी हो सकता है।<br />
Reference: Jagran</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80/feed</wfw:commentRss>
		</item>
		<item>
		<title>बसपा का फैसला</title>
		<link>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%ac%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%be</link>
		<comments>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%ac%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%be#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 03 May 2010 09:51:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Know About The BSP]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://blog.bspindia.org/?p=101</guid>
		<description><![CDATA[उत्तार प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने आपराधिक छवि वाले पांच सौ नेताओं को जिस तरह पार्टी से निकाला उसका अपना एक महत्व है, लेकिन उनका यह फैसला कुछ सवाल भी खड़े करता है। नि:संदेह हर कोई यह जानना चाहेगा कि जो पांच सौ लोग निकाले गए हैं वे कौन हैं और बसपा में किस हैसियत [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>उत्तार प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने आपराधिक छवि वाले पांच सौ नेताओं को जिस तरह पार्टी से निकाला उसका अपना एक महत्व है, लेकिन उनका यह फैसला कुछ सवाल भी खड़े करता है। नि:संदेह हर कोई यह जानना चाहेगा कि जो पांच सौ लोग निकाले गए हैं वे कौन हैं और बसपा में किस हैसियत से काम कर रहे थे? यदि इनके नाम-पते-पद आदि सार्वजनिक हो जाते तो बसपा के इस दावे को और अधिक बल मिलता कि उसके यहां आपराधिक छवि वालों के लिए कोई स्थान नहीं हैं। बसपा नेतृत्व ने जिस तरह इस सवाल से कन्नी काटी कि निकाले गए लोगों में कोई बड़ा नेता है या नहीं उससे यह सवाल उठ सकता है कि कहीं छुटभैय्ये नेताओं की ही छुंट्टी तो नहीं की गई? वस्तुस्थिति जो भी हो, यदि छोटे स्तर के ही पांच सौ नेता इस आरोप में निकाल बाहर किए गए हैं कि वे आपराधिक चरित्र अथवा छवि वाले हैं तो भी यह मामूली बात नहीं। ध्यान रहे कि राजनीतिक दल ऐसा कोई कदम उठाने से हिचकते हैं जिससे उनके दस-बीस वोट भी खतरे में पड़ते हों। मायावती ने भरोसा दिलाया है कि पार्टी में बाकी बचे आपराधिक छवि वाले लोगों को 13 मई तक बाहर किया जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि तब तक पांच सौ लोगों के नाम भी सार्वजनिक हो जाएंगे और कुछ बड़े नेताओं की भी छुंट्टी की जाएगी। नि:संदेह आदर्श स्थिति तो यह है कि आपराधिक इतिहास वाले सभी नेताओं को दरवाजा दिखाया जाए-चाहे वे विधायक हों या सांसद, लेकिन आज की राजनीति में किसी भी राजनीतिक दल से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपनी राजनीतिक शक्ति में कटौती करने वाला कोई कदम उठाएगा। ऐसे कदम तो तभी उठाए जा सकते हैं जब सभी राजनीतिक दल एक तरह से सामूहिक रूप से अपने-अपने दागियों की छुंट्टी करने के लिए आगे आएं। </p>
<p>यह विचित्र है कि बसपा के विरोधी राजनीतिक दल उसके जैसा कुछ करने के बजाय मायावती के फैसले में मीन-मेख निकाल रहे हैं। यदि बसपा दागी नेताओं से दूरी बनाए रखने का सिलसिला कायम रखती है और भविष्य में ऐसे नेताओं को पास नहीं फटकने देती तो आपराधिक इतिहास और चरित्र वाले तत्वों को यह संदेश जा सकता है कि उनके लिए कम से कम मायावती के दल में कोई जगह नहीं है। अच्छा हो कि ऐसा ही संदेश देने के लिए अन्य राजनीतिक दल भी सामने आएं। वैसे भी दागदार लोगों को राजनीति से दूर रखने का काम किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है और यह एक तथ्य है कि करीब-करीब सभी दलों में बाहुबलियों का बोलबाला है। एक बड़ी संख्या में ऐसे बाहुबली हैं जो बारी-बारी से कई राजनीतिक दलों का संरक्षण पा चुके हैं। भले ही राजनीतिक दल यह प्रचारित करें कि वे राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ हैं, लेकिन संसद और विधानसभाओं में ऐसे तत्वों की बढ़ती उपस्थिति यही बताती है कि उनकी कथनी-करनी में भारी अंतर है। सच यह भी है कि राजनीतिक दल आपराधिक छवि वाले लोगों को चुनाव मैदान से दूर रखने के मामले में निर्वाचन आयोग का सहयोग करने के लिए तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि अभी तक दागी उम्मीदवार की परिभाषा तक तय नहीं हो पा रही है। </p>
<p>Reference: Jagran</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%ac%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%be/feed</wfw:commentRss>
		</item>
		<item>
		<title>बाबा साहब डॉ. भीम राव अंबेडकर का असर</title>
		<link>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%ac-%e0%a4%a1%e0%a5%89-%e0%a4%ad%e0%a5%80%e0%a4%ae-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%a1</link>
		<comments>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%ac-%e0%a4%a1%e0%a5%89-%e0%a4%ad%e0%a5%80%e0%a4%ae-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%a1#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 15 Apr 2010 06:17:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Know About The BSP]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://blog.bspindia.org/?p=99</guid>
		<description><![CDATA[बाबा साहब का जन्म तो महाराष्ट्र में हुआ, लेकिन उनके सपनों को जमीन उत्तर प्रदेश में मिली। काशीराम का भी इस प्रदेश से कोई सीधा संबंध नहीं था, लेकिन राजनैतिक सत्ता द्वारा समाज के समीकरण बदलने के उनके सफल प्रयोग की आधारभूमि उत्तर प्रदेश ही बना। गंगा यमुना का यह मैदान हमेशा से भारत के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>बाबा साहब का जन्म तो महाराष्ट्र में हुआ, लेकिन उनके सपनों को जमीन उत्तर प्रदेश में मिली। काशीराम का भी इस प्रदेश से कोई सीधा संबंध नहीं था, लेकिन राजनैतिक सत्ता द्वारा समाज के समीकरण बदलने के उनके सफल प्रयोग की आधारभूमि उत्तर प्रदेश ही बना। गंगा यमुना का यह मैदान हमेशा से भारत के भाग्य का नियंता रहा है। </p>
<p>महाराष्ट्र में दलित समाज के तेवर विद्रोही रहे हैं। अंबेडकर के नेतृत्व में संचालित महाड़ जल आदोलन, कालाराम मंदिर प्रवेश इसके उदाहरण हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में दलित समाज की गुलामी इतनी संपूर्ण थी कि वे विद्रोह की सोच भी नहीं सकते थे। सदियों से जहां कोई आवाज भी न उठी हो, वह प्रदेश आज दलित सशक्तीकरण में देश का नेतृत्व कर रहा है। ऐसा क्यों है? इस पर बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार करने की जरूरत है। सामाजिक सशक्तीकरण के अभियान का प्रारंभिक चरण सबसे पहले यहाँ पूरा हुआ। दलित समाज उस हीनभावना से मुक्त हो चुका है, जो सदियों से उसकी पहचान बना हुआ था। सीना ठोंककर खड़े दलितों में आज सामाजिक गुलामी के कोई निशान बाकी नहीं हैं और यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। अफसोस होता है कि आजादी के आदोलन के दौर के किसी भी नेता ने इस सामाजिक समस्या को अपना लक्ष्य नहीं बनाया। गुलामी के कारण यहां अपने समाज में मौजूद थे और हम अंग्रेजों को जिम्मेदार बता रहे थे। सामाजिक संकीर्णताओं ने देश को बहुत क्षति पहुंचाई है। अगर भारतीय समाज चार वर्णो की जातिवादी, शोषक व्यवस्था में विभाजित न रहा होता तो मुहम्मद गोरी से लेकर लार्ड क्लाइव तक के लिए भी इस देश पर शासन कर पाना संभव होता? </p>
<p>अगर इस देश की बड़ी आबादी को शूद्र एवं पंचम वर्ग में डालकर मात्र श्रमिक एवं सेवा कार्यो की सीमाओं में ही निरूद्ध न कर दिया गया होता तो क्या यह संभव था कि मात्र बीस हजार सिपाहियों को लेकर बाबर दिल्ली के तख्त पर बैठ जाता। प्लासी के युद्ध में ऐन मौके पर अपनी पूरी सेना लेकर मीर जाफर अंग्रेजों से जा मिलता है। सिर्फ दिखावे के लिए कुछ गोलिया चलती हैं, घोड़े दौड़ते हैं और युद्ध खत्म हो जाता है। अगर भारतीय समाज सामाजिक भेद-भाव, शोषण का शिकार न रहा होता तो प्लासी के युद्ध के दोनों खिलाड़ियों अंग्रेजों और नवाबों में से किसी का भी कोई वजूद ही न होता। अगर शास्त्रों ने यह कहा होता कि विदेशी के शासन को बर्दाश्त करना धर्म विरुद्ध और पाप है तो किस प्रकार विदेशियों का शासन यहां होता, लेकिन नहीं, उन्होंने समाज को एक सूत्र में पिरोने के बजाय टुकड़ों में बांट दिया। इसीलिए भारतीय समाज में मुसीबतों के मुकाबले एक साथ खड़े होने की क्षमता ही नहीं आ सकी। इसलिए जब अंबेडकर कहते हैं कि भारत की समस्या के मूल में जाति वर्ण व्यवस्था है तो इसमें सत्यता का अंश सौ प्रतिशत है। सामाजिक गुलामी के रहते राजनैतिक आजादी का अर्थ क्या है? वे सामाजिक बराबरी की बात कहते हैं। आजादी के 62 वर्ष बाद भी उदाहरणस्वरूप मध्याह्न भोजन की स्कूली योजनाओं में बच्चों में एक साथ भोजन को लेकर सामाजिक भेदभाव की शिकायतें मिलती हैं। बाबा साहब दलितों के सामाजिक सशक्तीकरण का आदोलन खड़ा कर रहे थे। उन्होंने सवाल पूछा कि जो आजादी आप अंग्रेजों से अपने लिए चाहते हैं, क्या आप वही आजादी दलित वर्ग को भी देंगे? इसका कोई सीधा जवाब यहां तक कि गांधी ने भी नहीं दिया। आने वाले दिनों में आरक्षित सीटों पर राजनैतिक जमींदारों ने अपने पिछलग्गुओं को खड़ा कर पूना पैक्ट की मंशा का मजाक उड़ाया। पूना पैक्ट की उन्हीं असफलताओं ने आज दलित समाज को ताकत दी है। इससे तत्कालीन नेतृत्व की असलियत उजागर हुई। पूना पैक्ट वह आईना है, जिसमें समर्थ समाज अपना चेहरा देख कर शर्मिदा हो सकता है। इतिहास गवाह है कि राजनीति हमेशा से शक्ति की भाषा समझती रही है। जब तक दलित समाज ने अपने को कमजोर समझा, उनकी मजबूरियों और संघर्ष को समझने वाला कोई नहीं था। वहीं जब काशीराम ने राजनीति के नए नियम लिखे तो परिदृश्य दूसरा हो गया। हमने देखा है कि समाज में उचित स्थान पाने का एकमात्र माध्यम राजनैतिक सशक्तीकरण ही है। उत्तर प्रदेश के उदाहरण ने सिद्ध किया है कि सामाजिक क्रांतियों का रक्तरंजित होना कोई जरूरी नहीं। संक्रमण के इस दौर में उत्तर प्रदेश की यह राह जो आज अलग दिखती है, वह दरअसल हमें सामाजिक एकीकरण के राष्ट्रीय लक्ष्यों की ओर बड़ी मजबूती से ले जा रही है। </p>
<p>[वक्रम सिंह: लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]<br />
Reference: Jagran</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%ac-%e0%a4%a1%e0%a5%89-%e0%a4%ad%e0%a5%80%e0%a4%ae-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%a1/feed</wfw:commentRss>
		</item>
		<item>
		<title>21वीं सदी में जात-पात</title>
		<link>http://blog.bspindia.org/21%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a4</link>
		<comments>http://blog.bspindia.org/21%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a4#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 12 Mar 2010 06:06:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Know About The BSP]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://blog.bspindia.org/?p=97</guid>
		<description><![CDATA[हाल ही में उड़ीसा के गंजाम जिले के धुरुबुरई गांव में उच्च जातियों ने धोबी समुदाय के परिवारों पर डेढ़ लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। उनका दोष महज इतना है कि उन्होंने साल भर तक कपड़े धोने के लिए प्रति व्यक्ति 50 रुपए की मांग की थी। इससे पहले इस काम के उन्हें केवल [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हाल ही में उड़ीसा के गंजाम जिले के धुरुबुरई गांव में उच्च जातियों ने धोबी समुदाय के परिवारों पर डेढ़ लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। उनका दोष महज इतना है कि उन्होंने साल भर तक कपड़े धोने के लिए प्रति व्यक्ति 50 रुपए की मांग की थी। इससे पहले इस काम के उन्हें केवल 20 रुपए ही मिलते थे। इन दलितों को केवल जुर्माना लगाकर ही नहीं छोड़ा गया। इन्हें इस साल अपनी फसल काटने नहीं दी गई और बार-बार इन पर हमले किए जाते रहे। तथाकथित उच्च जातियों का तथाकथित निम्न जातियों पर अत्याचार का यह अकेला मामला नहीं है। पिछले कई सालों से पुरी जिले के नाई समुदाय के लोग अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए नामचारे पर तथाकथित उच्च जातियों के बाल काटने और पैर धोने से इनकार कर रहे हैं। तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में भारत के 60वें गणतंत्र दिवस पर एक तिरंगा फहराने का प्रयास कर रही एक दलित महिला सरपंच को चाकू घोंप दिया गया। पीड़िता ने बताया कि हमलावर स्थानीय निकाय का एक कर्मचारी है, जो ध्वजारोहण के समय ग्रामसभा की अध्यक्षता करने पर उसके खिलाफ नारेबाजी कर रहा था। औद्योगिक शहर कोयंबटूर के दिल में तथाकथित उच्च जाति के हिंदुओं ने दलितों को सड़क का इस्तेमाल न करने देने के लिए इस पर दीवार </p>
<p>बना दी थी। यह दीवार 30 जनवरी, 2010 को तोड़ी गई। </p>
<p>एक ऐसे ही मामले में मई 2008 को मदुराई के उथमपुरम गांव में एक दीवार तोड़ी गई थी। केवल साधारण परिस्थितियों में ही नहीं, तथाकथित उच्च जातियां संकट में फंसी होने पर भी दलितों को बहिष्कृत करना पसंद करती हैं। यह गुजरात के भूकंप और दक्षिण भारत में सूनामी के दौरान देखने को मिला। दोनों मामलों में राहत सामग्री के वितरण में दलितों को वंचित रखा गया। इसके अलावा, उच्च जातियों ने ऐसी कालोनियों का विरोध किया जिनमें दलितों समेत मिलीजुली जातियों के घर हैं। यह तो एक बानगी भर है। देश के कोने-कोने में दलितों को इस प्रकार के अत्याचार, बहिष्करण और भेदभाव का शिकार होना पड़ रहा है। दलितों की कठिन सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक दशा के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र की सामाजिक अवस्था 2010 पर रिपोर्ट में यह रेखांकित किया गया है कि दलित बड़ी दयनीय स्थितियों में रह रहे हैं। सामाजिक संकेतकों, जैसे बाल मृत्यु दल, उपभोग व्यय, साक्षरता और गरीबी में वे सामान्य जातियों से काफी पिछड़े हुए हैं और अति बहिष्करण का शिकार हैं। समाज के कुछ बौद्धिक और सजग प्रहरियों का तर्क है कि जातिवाद और जाति चेतना अतीत की बात है या फिर यह ग्रामीण समाज की अवधारणा है। हालांकि, सच्चाई यह है कि जाति व जातिवाद इतिहास का अनुभव नहीं है। न ही यह ग्रामीण अवधारणा मात्र है। शहरों में भी जाति प्रथा जिंदा है। अगर आपको इस पर विश्वास न हो तो इंटरनेट पर विवाह वेबसाइटों को खोलकर देख लीजिए। यहां आपको जाति, उप-जाति और उप-उप-जाति के वर-वधु की तलाश करते लोग मिलेंगे। </p>
<p>आइए, शहरी भारत में जाति पर नजर डालें। अन्य उच्च जाति 19, ब्राह्मण 9, अन्य पिछड़ी जाति 16, दलित 9, वैश्य 5, क्षत्रीय 4, अति पिछड़ी जाति 2- वर्ण और जाति के साथ यह संख्या कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के मंत्रिमंडल के सदस्यों की है। यह जानकारी एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित हुई है। इसके अलावा पहली दलित महिला के स्पीकर बनने की खबर भी पहले पेज की सुर्खियों में रही है। इसी प्रकार विदेश में शिक्षित और एक राजनीतिक परिवार की चौथी पीढ़ी के सदस्य दलित परिवार में मीडिया के सामने खाना खाते हैं और इसे प्रचारित करवाते हैं। दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के नवनिर्वाचित अध्यक्ष भी यही दोहराते हैं। </p>
<p>मूल प्रश्न यह है कि मीडिया और राजनेता एक वर्ग विशेष की जाति को रेखांकित करके क्या संदेश देना चाहते हैं? अगर लोगों में जातिगत चेतना नहीं है तो लोग भारतीय समाज के कुछ वर्र्गो की जाति की पृष्ठभूमि को क्यों जानने को आतुर रहते हैं। चैनलों के कैमरे के सामने इस प्रकार दलित के साथ भोजन करके ये राजनेता यही कहना चाहते हैं कि देखो, दलित हमसे कितने निम्न कोटि के हैं, फिर भी हम इनके साथ भोजन करके इन्हें उपकृत कर रहे हैं। दलितों के खिलाफ भेदभाव व बहिष्करण का एकमात्र कारण तथाकथित ऊंची जातियों की जातिवादी सोच है। यही वर्ग पंचायत से संसद तक निर्णायक भूमिका निभाता है। </p>
<p>[विवेक कुमार: लेखक जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर हैं]<br />
Reference: Jagran</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://blog.bspindia.org/21%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a4/feed</wfw:commentRss>
		</item>
		<item>
		<title>नेहरू-गांधी परिवार के नाम</title>
		<link>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%82-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae</link>
		<comments>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%82-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 12 Mar 2010 06:03:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Know About The BSP]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://blog.bspindia.org/?p=95</guid>
		<description><![CDATA[नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के नाम पर योजनाओं के नामकरण को अनुचित बता रहे हैं ए सूर्यप्रकाश
मार्च, 2009 को मैंने चुनाव आयोग का ध्यान खींचा था कि केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं का नामकरण कांग्रेस नेताओं के नाम पर करने से कांग्रेस को अनुचित लाभ मिल रहा है। केंद्र सरकार की योजनाओं में से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><b>नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के नाम पर योजनाओं के नामकरण को अनुचित बता रहे हैं ए सूर्यप्रकाश</b><br />
मार्च, 2009 को मैंने चुनाव आयोग का ध्यान खींचा था कि केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं का नामकरण कांग्रेस नेताओं के नाम पर करने से कांग्रेस को अनुचित लाभ मिल रहा है। केंद्र सरकार की योजनाओं में से अधिकांश नेहरू-गांधी परिवार के तीन सदस्यों के नाम पर चलाई जा रही हैं। मैंने कहा था कि अगर इस प्रक्रिया को नहीं रोका गया तो इससे कभी भी तमाम पार्टियों को समान अवसर नहीं मिल पाएंगे। मैंने आयोग से अर्ज किया है कि यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार को दिशानिर्देश दिए जाएं सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों का नामकरण राजनीतिक रूप से तटस्थ लोगों के नाम के आधार पर ही किया जाए। </p>
<p>मुख्य चुनाव आयुक्त को लिखे इस पत्र के मुख्य बिंदु और इनमें शामिल कानूनी मुद्दों पर अखबारों में चर्चा हो चुकी है। इस सुझाव की पहली वर्षगांठ पर बड़े खेद के साथ बताना पड़ रहा है कि इस संबंध में मुख्य चुनाव आयोग ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। यद्यपि इस महत्वपूर्ण इकाई के संचालन के लिए सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं, फिर भी महत्वपूर्ण मुद्दे उठाने वाले नागरिकों को जवाब देने में चुनाव आयोग में अनुशासन, लोकतांत्रिक मिजाज और बुनियादी शिष्टाचार की कमी स्पष्ट नजर आती है। मुख्य चुनाव आयुक्त को लिखे पत्र में मुख्य मुद्दे इस प्रकार थे- </p>
<p>पिछले 18 सालों से भी अधिक समय में कांग्रेस तमाम प्रमुख सरकारी कार्यक्रमों, परियोजनाओं और संस्थानों का नामकरण गांधी-नेहरू परिवार के तीन सदस्यों, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर कर रही है। मोटे तौर पर केंद्र और राज्य सरकार की करीब 450 योजनाएं, कार्यक्रम और संस्थान चल रहे हैं, जिनमें लाखों करोड़ रुपए व्यय हो रहे हैं। एक को छोड़कर सामाजिक क्षेत्र की तमाम योजनाएं इन तीन लोगों के नाम पर चल रही हैं। सैकड़ों सरकारी योजनाएं और कार्यक्रम ऐसे हैं जिनमें हजारों करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया है। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतिकरण योजना में 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 28 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान है। इसी प्रकार राजीव गांधी पेयजल अभियान में तीन साल के दौैरान 21 हजार करोड़ रुपए खर्च होने हैं। जवाहरलाल नेहरू अर्बन रिन्यूवल मिशन में अगले सात साल में 50 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाने हैं। इसके अलावा इंदिरा आवास योजना का वार्षिक बजट करीब 8 हजार करोड़ रुपए और इंदिरा गांधी नेशनल ओल्ड ऐज पेंशन स्कीम का 3.4 हजार करोड़ रुपए है। सार्वजनिक योजनाओं से लाभ उठाने के कांग्रेस के लालच की कोई थाह नहीं है। नेशनल क्रेच स्कीम में मात्र 90 करोड़ रुपए सालाना और लघु व अति लघु उद्यमिता के प्रोत्साहन के लिए जारी कार्यक्रम उद्यमी मित्र योजना कुल 1-2 करोड़ रुपए की ही है। ये कार्यक्रम भी राजीव गांधी के नाम पर चलाए जा रहे हैं। </p>
<p>प्रदेश सरकारों में भी गांधी-नेहरू परिवार के इन तीन सदस्यों के नाम पर योजनाओं का नामकरण करने की होड़ लगी है। उदाहरण के लिए, पोंडिचेरी में बच्चे जब भी नाश्ते करते हैं उनसे राजीव गांधी को याद करने की उम्मीद की जाती है, आंध्र प्रदेश में गरीब जब भी स्वास्थ्य योजना के कार्ड का इस्तेमाल करते हैं उन्हें राजीव गांधी को याद करना पड़ता है और इसी प्रदेश के किसानों की बछड़ा खरीदने से पहले इंदिरा गांधी को स्मरण करने की मजबूरी है। हरियाणा में, गरीब महिलाओं को शादी के वक्त इंदिरा गांधी का नाम लेना पड़ता है, क्योंकि इस उपलक्ष्य पर सरकार द्वारा शगुन के नाम पर दी जाने वाली धनराशि उन्हीं के नामकरण पर है। इसी प्रकार की सैकड़ों अन्य योजनाएं हैं, जिनकी सूची छापने के लिए जगह कम पड़ जाएगी। गांधी-नेहरू के नाम पर करीब 450 योजनाओं, कार्यक्रमों, शोधवृत्तियों, संस्थानों और खेल की ट्राफियों की सूची मेरी वेबसाइट एसूर्यप्रकाश.काम पर उपलब्ध है। </p>
<p>मैंने चुनाव आयोग से प्रार्थना की थी कि वह केंद्र सरकार और तमाम राज्य सरकारों को निर्देश दे कि इन याजनाओं के नामों से ऐसे व्यक्तियों के नाम हटाए जाएं, जिन्हें जनता विशिष्ट राजनीतिक दलों के नायकों के रूप में जानती है। मैंने कहा था कि इस प्रकार के निर्देश से आचार संहिता वास्तविक रूप में लागू होना सुनिश्चित हो सकता है। एक तरफ तो आचार संहिता छोटे-मोटे जुर्म जैसे सत्तारूढ़ दल के लोगों द्वारा चुनाव के दौरान सरकारी वाहनों का इस्तेमाल करने के खिलाफ है, वहीं दूसरी तरफ एक परिवार के तीन सदस्यों के नामकरण पर चलने वाली एक लाख करोड़ रुपए से अधिक की योजनाओं से कांग्रेस को लाभ उठाने की छूट दे रखी है। </p>
<p>इसके अलावा मैंने चुनाव आयोग का उसके ही अनेक ऐसे आदेशों की ओर ध्यान खींचा है, जिनसे लगता है कि आयोग चुनावी रणक्षेत्र में साफसुथरे नियमों को लागू करने का इच्छुक है। 2006 में जारी किए गए ऐसे ही निर्देशों में से एक केंद्र और राज्य के मंत्रियों को ऐसे बयान जारी करने से रोकने के संबंध में है, जिनसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के प्रभावित होने का खतरा है और चुनावी रणक्षेत्र में विभिन्न राजनीतिक दलों को प्रदान किए जाने वाले समान धरातल में बाधा पहुंचाता है। अगर महज मंत्रियों की बयानबाजी से राजनीतिक दलों का समान धरातल असमान हो जाता है तो चुनाव आयोग एक पार्टी को यह छूट कैसे दे सकता है कि वह अपने नेताओं के नाम पर योजनाओं का नामकरण करे और हमेशा के लिए इससे राजनीतिक लाभ उठाती रहे। </p>
<p>यद्यपि, मेरे सुझाव पर आयोग ने चुप्पी साध रखी है, फिर भी पिछले साल कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो निर्वाचन प्रक्रिया पर प्रभाव डालती हैं। एक साल पहले मैंने कहा था कि नेहरू-गांधी परिवार के तीन सदस्यों के नाम पर लाखों करोड़ों की योजनाएं चल रही हैं, किंतु महात्मा गांधी के नाम पर एक भी प्रमुख योजना नहीं है। इस पक्षपात छिपाने को उत्सुक सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का नाम महात्मा गांधी के नाम पर कर दिया है। हालांकि नामचारे की रस्मअदायगी के बाद वह फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आई है और वर्ली-बांद्रा सी-लिंक पुल का नामकरण राजीव गांधी के नाम पर कर दिया है। क्योंकि यह पुल इंजीनियरिंग का नायाब नमूना है, इसलिए इसका नामकरण किसी महानतम इंजीनियर जैसे सर एम विश्वेसवरा के नाम पर किया जाना चाहिए था। किंतु लगता है कि कांग्रेस पार्टी और नेहरू-गांधी परिवार से आधुनिक भारत के निर्माताओं के योगदान को सम्मान देने की गुजारिश करके उससे बहुत बड़ी चीज की मांग कर रहे हैं। </p>
<p>एक साल पहले उठाई गई मांग पर चुनाव आयोग की चुप्पी को आप क्या कहेंगे? क्या वास्तव में यह एक जन संस्थान है जो संविधानिक दायित्वों का निर्वाह कर सकता है और स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम है? मैं इसका फैसला पाठकों पर छोड़ता हूं कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की वचनबद्धता पर खरा उतरने में आयोग की चुप्पी के क्या निहितार्थ निकालते हैं। </p>
<p>[ए सूर्यप्रकाश: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]<br />
Reference: Jagran</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%82-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae/feed</wfw:commentRss>
		</item>
		<item>
		<title>कांग्रेस खा गई शक्कर पी गई तेल &#124;</title>
		<link>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%88-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%88</link>
		<comments>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%88-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%88#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 12 Jan 2010 18:33:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Know About The BSP]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://blog.bspindia.org/?p=93</guid>
		<description><![CDATA[मनमोहन सिंह इंदिरा गांधी सरीखे नहीं हैं और हो भी नहीं सकते, लेकिन उनका शासन इंदिरा गांधी के उन दिनों की याद दिला रहा है जब. वह इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा. वाले भाव से ग्रस्त थीं। भूतल परिवहन मंत्रालय राष्ट्रीय राजमार्गो पर जिस तरह हर 25 किलोमीटर पर सोनिया-मनमोहन सिंह के फोटो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मनमोहन सिंह इंदिरा गांधी सरीखे नहीं हैं और हो भी नहीं सकते, लेकिन उनका शासन इंदिरा गांधी के उन दिनों की याद दिला रहा है जब. वह इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा. वाले भाव से ग्रस्त थीं। भूतल परिवहन मंत्रालय राष्ट्रीय राजमार्गो पर जिस तरह हर 25 किलोमीटर पर सोनिया-मनमोहन सिंह के फोटो लगाने की तैयारी कर रहा है उससे इसी की पुष्टि होती है कि इंदिरा इज इंडिया..सरीखे युग की वापसी हो गई है। एक अनुमान के अनुसार राजमार्गो पर सोनिया-मनमोहन सिंह के फोटो लगाने पर 14 से 25 करोड़ रुपये के आसपास धन खर्च होगा। राजमार्ग प्राधिकरण ने सफाई दी है कि सोनिया-मनमोहन के फोटो टांगने पर जो रकम खर्च होगी वह सरकार के खजाने से नहीं, बल्कि सड़क बनाने वाली कंपिनयों द्वारा खर्च की जाएगी। यह तो और भी बुरा काम है। इसका सीधा मतलब है कि इन कंपनियों पर इसके लिए दबाव बनाया गया है कि वे अपनी जेब से पैसे खर्च कर सोनिया-मनमोहन के फोटो राजमार्गो पर सजाएं। इससे यह कहीं अच्छे से पता चल रहा है कि आम आदमी के साथ का दम भरने वाली सरकार के पास इस तबके की चिंता करने की भी फुर्सत नहीं रह गई है-और वह भी तब जब चीनी 50 और दालें 100 रुपये किलो बिक रही हैं। जाहिर है कि यदि मौजूदा हालात में खा गई शक्कर पी गई तेल, यह देखो कांग्रेस का खेल.. जैसे नारे लगाए जाएं तो अनुचित न होगा। यदि गृहमंत्री पी चिदंबरम और मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को छोड़ दिया जाए तो यह जानना कठिन है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत उनके शेष मंत्री क्या कर रहे हैं? इस सवाल का जवाब तब नहीं मिल रहा जब मनमोहन सिंह को इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं कि झारखंड में कांग्रेस सरकार क्यों नहीं बना सकी अथवा जगनमोहन रेड्डी पर लगाम कैसे लगाई जाए? </p>
<p>समस्या यह है कि आर्थिक विकास दर से रीझे चंद बुद्धिजीवियों द्वारा देश में ऐसा माहौल बना दिया गया है कि मनमोहन जैसी मन मोहने वाली सरकार का कोई जोड़ नहीं। चूंकि विपक्ष बिखराव से ग्रस्त है और संप्रग सरकार की आलोचना करना वर्जित कृत्य करार दिया गया है इसलिए कोई भी इस ओर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं कि विदेश नीति से लेकर अर्थनीति तक के प्रत्येक मोर्चे पर केंद्रीय सत्ता कितनी विफल है। महंगाई चरम सीमा को छूने के बाद भी जिस तरह थमने का नाम नहीं ले रही उससे केंद्रीय सत्ता को चिंतित होना चाहिए, लेकिन ऐसे संकेत तक नहीं नजर आते कि उसके लिए यह चिंताजनक मसला है। दालों, चीनी एवं अन्य खाद्य सामग्री के बेतहाशा बढ़ते मूल्यों के लिए उसके पास न केवल तरह-तरह के बहाने मौजूद हैं, बल्कि यह दो टूक जवाब भी कि महंगाई का सामना करने के अलावा और कोई उपाय नहीं। </p>
<p>खाद्य पदार्थो की कमी के लिए कभी कम उत्पादन को जिम्मेदार बनाया जाता है, कभी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी को और कभी राज्य सरकारों के उस रवैये को जिसके तहत जमाखोरों और कालाबाजारियों के खिलाफ कार्रवाई करने में आनाकानी की जा रही है। यदि महंगाई का कारण जमाखोरी है तो फिर कम पैदावार और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी का रोना क्यों रोया जाता है? सवाल यह भी है कि यदि महंगाई के लिए ये सभी कारक जिम्मेदार हैं तो फिर केंद्रीय सत्ता किस मर्ज की दवा है? यथार्थ यह है कि केंद्रीय सत्ता इतनी नाकारा है कि वह न तो कम पैदावार का अनुमान लगा सकी, न समय रहते दालों-चीनी आदि का आयात कर सकी। कहने को एक कृषि एवं खाद्य मंत्रालय है, लेकिन उसे न तो कृषि से मतलब है और न ही खाद्य संकट की चिंता करने से। देश यह भी महसूस कर रहा है कि मनमोहन का शरद पवार पर कोई जोर नहीं और शरद पवार को मनमोहन सिंह की कोई परवाह नहीं। शरद पवार जितने निरंकुश हैं, मनमोहन सिंह अपने निरंकुश मंत्रियों पर लगाम लगाने में उतने ही अक्षम हैं। वह किसी सेमिनार, सभा, सम्मेलन में भाषण देने के लिए ही अधिक स्वतंत्र-सक्षम नजर आते हैं। कोई नहीं जानता-शायद मनमोहन सिंह भी नहीं कि उन समस्याओं से निपटने के लिए क्या किया जा रहा है जो राष्ट्र के समक्ष मुंह बाए खड़ी हैं। चीन, पाकिस्तान तो दूर रहा, नेपाल और श्रीलंका तक पर भारत सरकार दबाव बनाने में अक्षम है। श्रीलंका में लाखों तमिलों के साथ भेड़-बकरियों की तरह व्यवहार किया जा रहा है, लेकिन प्रवासी सम्मेलन में उनकी चर्चा तक नहीं की गई। इसमें संदेह नहीं कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मनमोहन सिंह की विद्वता-विनम्रता का उल्लेख होता है, लेकिन लाख टके का सवाल है कि इससे भारत की जनता को हासिल क्या हो रहा है? मनमोहन सिंह सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में सौ दिन के एजेंडे की घोषणा करने और फिर उसकी कामयाबी का ढिंढोरा पीटने के बाद ऐसा कुछ भी नहीं किया कि उसे सक्षम, सक्रिय और संवेदनशील सरकार के खांचे में फिट किया जा सके। </p>
<p>यदि संप्रग सरकार का शेष कार्यकाल वैसे ही चलना है जैसे अब तक चला है तो उससे देश का मोह भंग होना तो तय है ही, देश का गंभीर समस्याओं से घिरना भी सुनिश्चित है और इसकी बानगी तेलंगाना मुद्दे पर केंद्र सरकार की गफलत से मिलती है। इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने वाली ताकतों के सामने मनमोहन सरकार असहाय ही अधिक है। मनमोहन सरकार एक सूरत में ही सही तरह चल सकती है जब आंतरिक सुरक्षा के समक्ष उत्पन्न चुनौतियां समाप्त हो जाएं, देश को नुकसान पहुंचाने वाली बाहरी ताकतें शांत हो जाएं, मानसून मेहरबानी दिखाता रहे और न्यायपालिका अपनी समस्याओं का समाधान खोजने में सफल हो जाए। दुर्भाग्य से ऐसा कुछ होने के आसार दूर-दूर तक नहीं हैं और आम चुनाव आने में अभी चार वर्ष से अधिक का समय शेष है। क्या तब तक ऐसे ही चलेगा? इस सवाल पर विपक्ष विचार करे या न करे, आम जनता को अवश्य करना चाहिए।<br />
Reference: Jagran<br />
[राजीव सचान : लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं]</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%88-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%88/feed</wfw:commentRss>
		</item>
		<item>
		<title>विकास का रास्ता (कांग्रेस की महंगाई ही विकास का रास्ता)</title>
		<link>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8</link>
		<comments>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 09 Dec 2009 19:25:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Know About The BSP]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://blog.bspindia.org/?p=89</guid>
		<description><![CDATA[उत्तर प्रदेश के दौरे पर गए राहुल गांधी इस कारण ज्यादा चर्चा में हैं कि उनका हेलीकॉप्टर कथित तौर पर अंधेरे में उतरा, लेकिन उनके इस बयान पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि राज्य में कांग्रेस की सरकार बनने पर ही विकास का रास्ता खुलेगा। चूंकि उन्होंने इसी तरह के बयान अन्य गैर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>उत्तर प्रदेश के दौरे पर गए राहुल गांधी इस कारण ज्यादा चर्चा में हैं कि उनका हेलीकॉप्टर कथित तौर पर अंधेरे में उतरा, लेकिन उनके इस बयान पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि राज्य में कांग्रेस की सरकार बनने पर ही विकास का रास्ता खुलेगा। चूंकि उन्होंने इसी तरह के बयान अन्य गैर कांग्रेस शासित राज्यों में भी दिए हैं इसलिए यह आभास होना स्वाभाविक है कि वह कांग्रेस शासन को विकास की गारंटी सिद्ध कर रहे हैं। केंद्र में सत्तारूढ़ दल को अपनी क्षमता का बखान करने की पूरी स्वतंत्रता है, लेकिन उसकी ओर से किसी गैर कांग्रेस शासित राज्य में ऐसा संदेश देना ठीक नहीं कि सिर्फ उसके सत्ता में आने पर ही विकास होगा, खासकर गैर चुनावी मौसम में। यदि एक क्षण के लिए यह मान लिया जाए कि कांग्रेस का शासन विकास की गारंटी है तो देश ऐसे किसी कांग्रेस शासित राज्य से परिचित होना चाहेगा जहां विकास की गंगा बह रही हो। क्या आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान आदि राज्य विकास के अद्भुत प्रतिमान रच रहे हैं? क्या यह किसी से छिपा है कि इस राज्य के कुछ हिस्से शर्मसार करने वाली निर्धनता से दो-चार हैं? यह सही नहीं कि गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुकाबले कांग्रेस शासित राज्य कहीं अधिक खुशहाल और विकास एवं जनकल्याण के प्रति समर्पित हैं। यह निराशाजनक है कि राहुल गांधी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश दे रहे हैं कि राज्यों में कांग्रेस की सरकार होगी तो केंद्रीय सत्ता उनके प्रति उदारता दिखाएगी। केंद्र में सत्तारूढ़ दल को यह शोभा नहीं देता कि वह यह प्रतीति कराए कि उसके अपने दल वाली राज्य सरकारें कहीं अधिक सुविधाएं अथवा रियायत पाएंगी। </p>
<p>ऐसा लगता है कि कांग्रेस उस पुरानी मानसिकता का परित्याग नहीं कर पा रही जिसके तहत एक समय उसके नेतृत्व वाले केंद्रीय शासन को अन्य दलों द्वारा शासित राज्य फूटी आंख नहीं सुहाते थे। इसी मानसिकता के कारण राष्ट्रपति शासन के दुरुपयोग का रिकार्ड उसके नाम दर्ज हुआ। भले ही केंद्र सरकार चाहे जैसे दावे करे, गैर कांग्रेस शासित राज्यों की यह शिकायत दूर होने का नाम नहीं ले रही कि केंद्रीय सत्ता उनकी समस्याओं के समाधान के प्रति सजग-सचेत नहीं। यह भारतीय राजनीति की अपरिपक्वता का ही परिचायक है कि केंद्र-राज्य में सत्तारूढ़ दलों के बीच राजनीतिक मतभेद उभरते ही सरकारों के स्तर पर भी पाले खिंच जाते हैं और विकास के मामले में राजनीति होने लगती है। अब तो राजनीतिक लाभ-हानि के फेर में विकास योजनाओं की अनदेखी करने से भी नहीं चूका जाता। नि:संदेह कई बार ऐसा राज्यों की ओर से भी होता है, लेकिन मौका पड़ने पर केंद्रीय शासन भी असहयोग भाव दिखाने से खुद को रोक नहीं पाता। जब ऐसा होता है तो दुष्परिणाम राज्य विशेष की जनता को भोगना पड़ता है। राहुल गांधी अपने बयानों के जरिये यह भी रेखांकित कर रहे हैं कि केंद्र सरकार न केवल विकास, बल्कि निर्धन तबकों और युवाओं के कल्याण के लिए भी प्रतिबद्ध है, लेकिन महंगाई से कराह रही आम जनता के प्रति जैसी संवेदनहीनता दिखाई जा रही है उससे तो किसी के लिए भी यह कहना कठिन है कि केंद्रीय शासन को आम आदमी की तनिक भी चिंता है।<br />
Reference : jagran</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8/feed</wfw:commentRss>
		</item>
		<item>
		<title>एक अनूठा आयोजन</title>
		<link>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%82%e0%a4%a0%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%9c%e0%a4%a8</link>
		<comments>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%82%e0%a4%a0%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%9c%e0%a4%a8#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 02 Nov 2009 19:15:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Know About The BSP]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://blog.bspindia.org/?p=85</guid>
		<description><![CDATA[अक्टूबर में बाबासाहेब अंबेडकर के अनुयायियों ने दुनियाभर में धम्मचकपावतन पर्व धूमधाम से मनाया। धम्मचकपावतन शब्द पाली भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है धर्म के चक्र को गतिशील करना। इससे पहले अशोक विजय दशमी के अवसर पर लाखों बौद्धों ने दीक्षा भूमि मेले में हिस्सा लिया। बाबासाहेब के अनुयायियों का मानना है कि [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अक्टूबर में बाबासाहेब अंबेडकर के अनुयायियों ने दुनियाभर में धम्मचकपावतन पर्व धूमधाम से मनाया। धम्मचकपावतन शब्द पाली भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है धर्म के चक्र को गतिशील करना। इससे पहले अशोक विजय दशमी के अवसर पर लाखों बौद्धों ने दीक्षा भूमि मेले में हिस्सा लिया। बाबासाहेब के अनुयायियों का मानना है कि 1956 में अशोक विजय दशमी के दिन अंबेडकर ने दूसरी बार धम्म के चक्र को गतिमान किया। 2250 साल पहले गौतम बुद्ध ने धम्म चक्र को पहली बार गतिशील किया था। यह भी कहा जाता है कि बाबासाहेब अंबेडकर ने जानबूझकर इस दिन को चुना था, जब महान अशोक ने हथियारों का त्याग कर बौद्ध दर्शन को जीवन पद्धति के रूप में अपनाया था। इसके बाद से उनके अनुयायी हर साल धम्मचकपावतन मनाते हैं। </p>
<p>बुद्ध का पथ दिखाने वाले अपने नेता को श्रद्धासुमन अर्पित करने के लिए देश के कोने-कोने से लाखों लोगों ने दीक्षा भूमि मेले में भाग लिया। भारत में करीब-करीब मृतप्राय बुद्ध की विरासत को पुनर्जीवित करने वाले अंबेडकर ही थे। दीक्षा भूमि पर धम्मचकपावतन पर्व का आयोजन दो दिनों तक चला। आयोजन से एक-दो दिन पहले ही लोगों का तांता लगने लगा था, जो कार्यक्रम संपन्न होने तक वहां डटे रहे। इसमें मुख्य आयोजन बुद्ध वंदना, त्रिसरन और पंच-शील थे। जिस स्थान पर बाबासाहेब ने दीक्षा ली थी उसी स्थान पर रखे उनके स्मृतिचिह्नंों का लोग फेरा लगाते हैं। यह भवन बौद्ध वास्तुशिल्प के अनुसार बना है। चारो तरफ स्टाल सजे हुए थे, जिनमें विभिन्न वस्तुएं बेची जा रही थीं। इनमें बुद्ध और अंबेडकर की प्रतिमाएं और दलित आंदोलन से संबंधित किताबें, सीडी, कैसेट शामिल हैं। इसके अलावा बाबासाहेब की तस्वीर वाले चाबी के गुच्छे, पोस्टर, लाकेट आदि भी स्टालों पर बिक रहे थे। अपने दोस्तों और प्रियजनों को तोहफे देने के लिए लोग मेले से इन सामानों की बड़ी संख्या में खरीदारी कर रहे थे। इन वस्तुओं की तुलना तीर्थयात्रियों के प्रसाद से की जा सकती है। हालांकि तीर्थयात्रियों के प्रसाद में फूल, सूखे मेवे और मिठाई होती हैं, जबकि इसमें किताबें और मूर्तियां थीं। </p>
<p>यह एक तथ्य है कि बुद्ध की प्रतिमाएं दुनिया भर में बेची जा रही हैं। हालांकि जिस प्रकार श्रीलंका में बौद्ध विहार एक तीर्थ का स्थान ग्रहण कर रहे हैं वैसा भारत में नहीं हो रहा है। श्रीलंका के एक बड़े बौद्ध केंद्र कैंडी में भ्रमण के दौरान मैंने बौद्ध विहारों में संचालकों को भारी धनराशि की मांग करते हुए देखा। यहां तक कि प्रसिद्ध टूथ रेलिक टेंपल, जिसके बारे में प्रसिद्ध है कि यहां गौतम बुद्ध का दांत रखा हुआ है, में बौद्ध महंत खुलकर दान-दक्षिणा मांग रहे थे। एक और स्थल जहां बुद्ध की साठ फुट ऊंची प्रतिमा एक पहाड़ी पर लगी हुई है, उसमें चढ़ने के लिए पचास रुपये का भुगतान करना पड़ता है। शहर में जगह-जगह बुद्ध की प्रतिमाएं बौद्ध पंथ के व्यवसायीकरण की कहानी कह रही हैं। </p>
<p>नागपुर में दीक्षा भूमि पर आयोजित इस मेले में विभिन्न संगठनों ने भी भाग लिया। इन संगठनों ने अनेक जनसभाएं कीं। उनके विमर्श का मुख्य बिंदु बौद्ध चिंतन और अनुसूचित जातियों की वर्तमान दशा था। आजकल देखने में आ रहा है कि अनुसूचित जातियां खुद अपने संसाधनों से इस प्रकार के आयोजन करती हैं। इसी प्रकार दुनिया भर में फैले दलित धम्मचकपावतन पर्व मना रहे हैं। खासतौर से इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा आदि देशों में काफी संख्या में बौद्ध विहारों की स्थापना की जा चुकी है। उन्होंने भारत में बौद्ध विहार की स्थापना के लिए भी धन भेजना शुरू कर दिया है। पंजाब और महाराष्ट्र इस प्रकार की भारी सहायता प्राप्त कर रहे हैं, क्योंकि इन दोनों राज्यों से ही भारी संख्या में दलित दुनिया के अलग-अलग भागों में गए हैं। मेले के समापन पर युवा स्वयंसेवकों ने अनोखा आयोजन किया। उन्होंने ताबीज, धागे जैसे वाह्यं पंथिक स्मृति चिह्नंों को जलाया। स्वयंसेवकों ने मेले में शामिल लोगों को समझा-बुझा कर उनसे ये चिह्नं एकत्र किए। उन्होंने बताया कि इन प्रतीक चिह्नंों से अंधविश्वास फैलता है। जिन लोगों ने उनके कहने पर ये चिह्नं उन्हें नहीं सौंपे उनके चिह्नं जबरन छीन लिए गए। स्वयंसेवकों का मानना था कि ताबीज जैसी चीजें गौतम बुद्ध की शिक्षा के खिलाफ हैं। बुद्ध ने आप: दीपो भव: की शिक्षा दी थी, जिसका अर्थ है खुद ही दीपक बनो यानी अपने अंदर ज्ञान का संचार करो। बाबासाहेब का मानना था कि समाज में सामाजिक नियंत्रण के लिए कानून ही काफी नहीं है। सामाजिक नियंत्रण के लिए कानून से परे जाना होगा और उन्हें इसका जवाब बौद्ध दर्शन में मिला। यह हैरत की बात है कि अंबडेकर के अनुयायियों की इस पूरी कवायद की राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया में चर्चा नहींहुई। </p>
<p>[विवेक कुमार : लेखक जेएनयू में प्राध्यापक हैं]<br />
[ जागरण ] </p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%82%e0%a4%a0%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%9c%e0%a4%a8/feed</wfw:commentRss>
		</item>
		<item>
		<title>क्वात्रोची से कांग्रेस की हमदर्दी देश की न्याय व्यवस्था के ताबूत में आखिरी कील</title>
		<link>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%9a%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%95</link>
		<comments>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%9a%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%95#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 09 Oct 2009 18:44:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Know About The BSP]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://blog.bspindia.org/?p=82</guid>
		<description><![CDATA[जो लोग यह सोचते हैं कि मनमोहन सिंह सरकार ने बोफोर्स तोपों की खरीद में 73 लाख डालर की दलाली लेने वाले इटली के व्यवसायी ओेतावियो क्वात्रोची से आपराधिक मामले वापस लेने का जो निर्णय लिया उससे बोफोर्स घोटाले के ताबूत में आखिरी कील गड़ गई है वे गलती पर हैं। वास्तविकता यह है कि [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>जो लोग यह सोचते हैं कि मनमोहन सिंह सरकार ने बोफोर्स तोपों की खरीद में 73 लाख डालर की दलाली लेने वाले इटली के व्यवसायी ओेतावियो क्वात्रोची से आपराधिक मामले वापस लेने का जो निर्णय लिया उससे बोफोर्स घोटाले के ताबूत में आखिरी कील गड़ गई है वे गलती पर हैं। वास्तविकता यह है कि कांग्रेस आलाकमान से अपनी नजदीकी के लिए चर्चित क्वात्रोची, जो भारत के करदाताओं का पैसा लेकर रफूचक्कर हो गया, के खिलाफ मामला वापस लेने का सरकार का यह शर्मनाक फैसला देश की न्याय व्यवस्था के ताबूत में आखिरी कील है। आजादी के बाद यद्यपि देश में अनेक घोटाले हुए हैं, किंतु एक भी घोटाले में सरकार ने बड़ी बेचैनी से वर्र्षो तक यह सुनिश्चित करने का प्रयास नहीं किया कि खुद उसके जांचकर्ता एक ऐसे व्यक्ति को नहीं पकड़ पाएं जो रक्षा सौदे में दलाली लेने का आरोपी है। न ही किसी सरकार ने इतने दृढ़ निश्चय और प्रतिबद्धता के साथ न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास को डिगाने के लिए पुरजोर मेहनत की है।</p>
<p>कांग्रेस के प्रवक्ता और कुछ व्यक्तियों, जिनमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शामिल हैं, की दलीलें भी सच्चाई को मिटा नहीं पाई हैं। हमें इस मामले के तथ्यों पर नजर डालनी चाहिए। 1980 के अंत में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तब भारत ने स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स से तोपें खरीदीं। करार पर हस्ताक्षर होने के एक साल बाद स्वीडन के रेडियो ने प्रसारित किया कि सौदा हासिल करने के लिए बोफोर्स ने भारत के राजनेताओं को घूस दी। सरकार की तरफ से मध्यस्थता करने वाले बिचौलियों को मोटा कमीशन दिया गया। राजीव गांधी ने इन आरोपों का खंडन किया और आरोपों की जांच के लिए एक जांच समिति बना दी, जिसमें उनके विश्वासपात्र भरे हुए थे। इस समिति ने यह दावा करके संसद के नाम पर बट्टा लगा दिया कि इस सौदे में बोफोर्स द्वारा कोई कमीशन या घूस नहीं दी गई थी। खोजी मीडिया ने इस दावे की धज्जिायां उड़ा दीं। उसने अनेक स्विस बैंक खातों का हवाला देते हुए दस्तावेज पेश किए, जिनसे साफ हो जाता था कि बोफोर्स ने कमीशन दिया है। इनमें से दो खाते ओतावियो क्वात्रोची और उनकी पत्नी मारिया के नाम से थे। 1989 में राजीव गांधी चुनाव हार गए और वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता दल नीत गठबंधन सरकार सत्ता में आ गई। इस सरकार ने जांचकर्ताओं को बाहर भेजा और उन्होंने बोफोर्स द्वारा किए गए भुगतान के पक्के साक्ष्य हासिल कर लिए। जैसे ही जांच आगे बढ़ी, क्वात्रोची गायब हो गया और भारत ने उसे खोजने के लिए इंटरपोल को रेड कार्नर नोटिस जारी करने को कहा। इंटरपोल ने इस बात की पुष्टि की कि क्वात्रोची ने बोफोर्स से मिला पैसा स्विट्जरलैंड से लंदन स्थित दो बैंकों में स्थानांतरित करा लिया है। मनमोहन सिंह के पूर्ववर्तियों ने इन साक्ष्यों पर कार्रवाई करते हुए इंग्लैंड के अधिकारियों से इन बैंक खातों को सील करा लिया।</p>
<p>कांग्रेस आलाकमान के करीबी समझे जाने वाले क्वात्रोची की सहायता करने के लिए मनमोहन सिंह ने अनेक कार्य किए। उन्होंने दिसंबर 2005 में एक अधिकारी को लंदन भेजा, जिसने इंग्लैंड के अधिकारियों को सूचित किया कि इन खातों से प्रतिबंध हटाने में भारत सरकार को कोई आपत्ति नहीं है। जब यह धोखेबाजी का कृत्य सामने आया तो जनवरी 2006 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया कि जब तक सरकार के इस अजीब कदम के कारणों का खुलासा न हो, यह सुनिश्चित किया जाए कि क्वात्रोची बैंक से पैसा न निकाल पाए। हालांकि जब तक कोर्ट यह आदेश जारी करता, क्वात्रोची ने इन दो खातों से रकम करीब-करीब साफ कर दी।</p>
<p>इसके बाद फिर छल किया गया। इंटरपोल का रेड कार्नर नोटिस वैध रहने के दौरान 6 फरवरी, 2007 को क्वात्रोची को अर्जेटीना में पकड़ लिया गया था। 8 फरवरी को सीबीआई को इसकी सूचना मिल गई थी। सरकार की प्रतिक्रिया देखकर ऐसा लगा कि जैसे अर्र्जेटीना की मुस्तैदी से क्वात्रोची से अधिक भारत को सदमा लगा। सरकार का दोहरा आचरण इस तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि उसने 13 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उससे यह तथ्य छिपाए रखा। सीबीआई ने क्वात्रोची की हिरासत का खुलासा 23 फरवरी को तब किया जब क्वात्रोची को जमानत पर रिहा कर दिया गया। सरकार ने क्वात्रोची की हिरासत को 17 दिनों तक क्यों छिपाए रखा? इसका सूत्र इसमें है कि 10 से 15 फरवरी के बीच इटली के प्रधानमंत्री भारत दौरे पर थे। यह एक सुखद संयोग है कि क्वात्रोची का बेटा मैसिमो क्वात्रोची को भी उनके साथ आने का सौभाग्य मिला। 22 फरवरी को अपने पिता की हिरासत की सूचना भारत सरकार द्वारा सार्वजनिक किए जाने से एक दिन पहले वह वापस चला गया।</p>
<p>इस घोषणा के बाद समय बर्बाद करने का दौर तब तक चलता रहा जब तक अर्जेंटीना की अदालत ने वैध दस्तावेज पेश न करने और क्वात्रोची को इटली जाने की अनुमति देने पर सीबीआई को आड़े हाथों लिया। 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से जब मनमोहन सिंह हमें लोकतंत्र और कानून के शासन पर भाषण दे रहे थे तब क्वात्रोची मिलान पहुंचा और अपनी स्वतंत्रता का जश्न मनाया। जैसे यह ही काफी नहीं था, अर्र्जेटीना की सरकार ने भारत को क्वात्रोची के कानूनी खर्च का भुगतान करने को कहा। मनमोहन सरकार ने क्वात्रोची की अगली बड़ी तरफदारी यह की कि उसने अप्रैल 2009 में इंटरपोल से क्वात्रोची के खिलाफ जारी रेड कार्नर नोटिस वापस लेने को कहा। इस शर्मनाक हरकत का बचाव करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की कि क्वात्रोची मामले के कारण विश्व में भारत की फजीहत हो रही थी, क्योंकि दुनिया यह मान रही है कि हम उसे परेशान कर रहे हैं।</p>
<p>अब यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि क्वात्रोची को बचाना कांग्रेस नेतृत्व की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से रहा है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनमोहन सिंह इस प्राथमिकता को समझ चुके हैं। जनवरी 2006 में, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि लंदन के बैंक में जमा घूस की रकम को क्वात्रोची निकाल ले जाएं। फरवरी 2007 में अर्जेटीना द्वारा क्वात्रोची को हिरासत में लेने पर केंद्र सरकार ने इस बात का पूरा इंतजाम किया कि सीबीआई अपने पैर पीछे खींच ले और वहां की अदालत में एक मूर्ख की भांति खड़ी हो जाए। क्वात्रोची को वापस इटली जाने और स्वतंत्रता हासिल करने की अनुमति दी गई। अप्रैल 2009 में इंटरपोल से रेड कार्नर नोटिस वापस लेने के लिए कहा गया और अब चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट को सूचित किया गया कि सरकार क्वात्रोची के खिलाफ आपराधिक मामला वापस लेना चाहती है, क्योंकि इस मामले में कुछ बचा नहीं है। किसी भी प्रधानमंत्री ने एक सरासर आपराधिक कृत्य को गैर-आपराधिक साबित करने में इतनी तन्मयता नहीं दिखाई। अब हमें कानून के शासन और न्याय व्यवस्था पर केंद्रीय सत्ता के कर्णधारों के एक और प्रवचन का इंतजार करना चाहिए।</p>
<p>[ए. सूर्यप्रकाश: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]</p>
<p><b>Jagran.com</b></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%9a%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%95/feed</wfw:commentRss>
		</item>
		<item>
		<title>कठघरे में सिर्फ मायावती सरकार क्यों?</title>
		<link>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%95%e0%a4%a0%e0%a4%98%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ab-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b8</link>
		<comments>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%95%e0%a4%a0%e0%a4%98%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ab-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b8#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 17 Sep 2009 19:07:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Know About The BSP]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://blog.bspindia.org/?p=79</guid>
		<description><![CDATA[हाल में सुप्रीम कोर्ट ने मायावती सरकार को यह कहकर फटकार लगाई है कि वह यूपी में सात जगहों पर अपनी पार्टी के नेताओं और नायकों के स्मारकों के निर्माण के मामले में अदालत के आदेशों का उल्लंघन कर रही है। कोर्ट ने इन पर हो रहे खर्च की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-weight: bold;">हाल में सुप्रीम </span>कोर्ट ने मायावती सरकार को यह कहकर फटकार लगाई है कि वह यूपी में सात जगहों पर अपनी पार्टी के नेताओं और नायकों के स्मारकों के निर्माण के मामले में अदालत के आदेशों का उल्लंघन कर रही है। कोर्ट ने इन पर हो रहे खर्च की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए सभी स्मारकों का निर्माण कार्य अविलंब रोकने को कहा था। अदालत की मुख्य आपत्ति इस बात को लेकर है कि इन स्मारकों में मायावती समेत बीएसपी और दलित समाज के नेताओं की मूर्तियां लगाने के काम में करीब 2600 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जोकि असल में जनता के धन की बर्बादी है। एक ऐसे वक्त में जबकि यूपी को सूखे का सामना करना पड़ रहा है, राज्य की कानून-व्यवस्था ठीक नहीं है और प्रदेश की माली हालत भी जर्जर है, स्मारकों पर इतनी भारी धनराशि व्यय होना कहीं से भी उचित नहीं जान पड़ता। जहां तक मूर्तियों, स्मारकों और अन्य प्रतीकों की स्थापना की बात है, तो सत्ता में पहुंचे विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने-अपने नेताओं की याद में ऐसे कई काम किए हैं। इन पार्टियों ने अपने वोट बैंक का खयाल करते हुए हर प्रभावशाली तबके-समुदाय से जुड़ी विभूतियों की मूर्तियां और स्मारक भी बड़े पैमाने पर बनाए हैं। अब से पहले स्मारकों, मूर्तियों आदि के निर्माण पर कभी ज्यादा ऐतराज नहीं देखने को मिला है। अलबत्ता यह जरूर हुआ है कि जब भी किसी समुदाय के सम्मानित नेता की मूर्ति को द्वेषवश नुकसान पहुंचाने की कोशिश हुई, तो उससे तनाव फैला है।<br />
मायावती सरकार जिन स्थानों पर मूर्तियां या स्मारक बनवा रही है, ज्यादातर वे जगहें नए बनाए या विकसित किए जा रहे पार्कों का हिस्सा हैं। लखनऊ और नोएडा में विशालकाय पार्कों के एक हिस्से में प्लैटफॉर्म बनाकर उन पर मूर्तियां लगाई जा रही हैं। इन पार्कों का इस्तेमाल आम जन टहलने आदि के लिए करते रह सकते हैं। देश के दूसरे हिस्सों में भी कई एयरपोर्ट, स्टेडियम और सड़कें ऐसी हैं, जिनका नामकरण सत्तारूढ़ दलों द्वारा राजनीतिक उद्देश्य से ही किया गया है। सवाल उठता है कि जब पहले कभी इस पर आपत्ति नहीं जताई गई, तो आंबेडकर पार्कों और दलित नेताओं की मूर्तियों की स्थापना पर ही इतनी हायतौबा क्यों मचाई जा रही है? आंबेडकर पार्क भी जनता के उपयोग के लिए ही बन रहे हैं।</p>
<p>इसी से जुड़ा दूसरा सवाल यह है कि क्या पहले ऐसे सभी निर्माण कामों पर सार्वजनिक धन की बजाय पार्टी फंड खर्च किया गया है? महाराष्ट्र सरकार अरब सागर में 350 करोड़ रुपये के खर्च से छत्रपति शिवाजी की जो प्रतिमा लगाने जा रही है, क्या उसका पैसा पार्टी फंड से आएगा? क्या उसका मकसद सत्तारूढ़ दल की ओर एक नए वोट बैंक को अपनी तरफ आकर्षित करने का नहीं है?</p>
<p>यह भी जरूरी नहीं है कि इस तरह के सभी स्मारक सार्वजनिक उपयोग की अनिवार्यता के साथ बनाए जाते रहे हों। दिल्ली में अनेक नेताओं के नाम पर न्यास या ट्रस्ट बने हैं, जिनके लिए सरकार ने बेशकीमती जमीनें मुफ्त या सस्ते में आवंटित की हैं, उनका इसके अलावा और क्या मकसद है कि वे एक व्यक्ति, विचारधारा और पार्टी के प्रचार का जरिया हैं?</p>
<p>यहां कुछ महत्वपूर्ण सवाल खड़े होते हैं। जैसे यह कि क्या इसकी कोई स्पष्ट नीति है कि स्मारक आदि के निर्माण के लिए सरकारी जमीन किसे दी जाए और किसे नहीं? अगर स्वाधीनता आंदोलन में योगदान के आधार पर किसी विभूति के स्मारक और पार्क के लिए जमीन दी जा सकती है, तो मायावती को संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर पार्क बनवाने का हक क्यों नहीं मिल सकता? अगर एक पार्टी अपने बड़े नेता, पूर्व प्रधानमंत्री या पूर्व मुख्यमंत्री की स्मृति में दिल्ली में कोई यादगार स्थापित करवा सकती है, तो बीएसपी की सरकार भी अपने संस्थापक कांशीराम की मूर्तियां यूपी के पार्कों में क्यों नहीं लगवा सकती? अगर इस पर ऐतराज है तो उसे स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर किस सामाजिक योगदान या योग्यता के आधार पर किसी विभूति के नाम पर बनाए जा रहे ट्रस्ट को मुफ्त या रियायती दरों पर जमीन का आवंटन हो सकता है।</p>
<p>दिल्ली में सिर्फ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि को छोड़कर विशाल क्षेत्रफल वाली अन्य कई नेताओं की समाधियों पर असरदार लोग वर्ष में एक-दो बार ही नमन करते पहुंचते हैं। क्या राजधानी में इन जगहों पर कुछ जनोपयोगी निर्माण नहीं हो सकते थे? ये जमीनें बेहद कीमती हैं, लेकिन इनकी कीमत को लेकर न तो सरकार को कभी कोई चिंता हुई, न कोई बड़ा जनांदोलन इस संबंध में चलाया गया, न ही कोर्ट ने कभी इसका संज्ञान लिया। क्या कभी यह तर्क दिया गया कि जहां लाखों लोग मलिन बस्तियों में जीवन बसर करने को बाध्य हैं, वहां ऐसी विशाल समाधियां बनानेके पीछे नैतिक और संवैधानिक आधार क्या है।</p>
<p>यही नहीं, देश में ऐसे भी कई वाकये हुए हैं जब किसी देवता-पीर आदि के नाम पर रातोंरात सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया गया। जमीन वापस लेना तो दूर, समुदायों के दबाव में प्रशासन किसी निर्माणाधीन सड़क के बीच में पड़ने वाले उन कथित पूजा स्थलों को हटवाने की हिम्मत तक नहीं कर सका। बेहद पॉश इलाकों में पड़ने में वाले ऐसे पूजा स्थलों पर, जो किसी सार्वजनिक कार्य या निर्माण में बाधा बने हुए हैं, कोर्ट को नोटिस क्यों नहीं लेना चाहिए?</p>
<p>जो सवाल मायावती सरकार द्वारा कराए जा रहे निर्माण कामों को लेकर उठ रहे हैं, उन्हें अन्य सरकारों के ठीक ऐसे ही निर्माणों पर भी उठाया जाना चाहिए। जमीन के आवंटन और मूर्तियों-स्मारकों के निर्माण पर होने वाले खर्च की संवैधानिक वैधता की पड़ताल अगर यूपी सरकार के संदर्भ में जरूरी है, तो यह जरूरत उन सभी ट्रस्टों, स्मारकों और पार्कों के संबंध में भी कतई कम नहीं है, जिन्हें रियायती या मुफ्त जमीनें दी गई हैं और जिन पर असल में जनता का ही पैसा खर्च हुआ है। अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो कल मायावती सरकार को यह कहने का अधिकार होगा कि आंबेडकर पार्कों और उनके नेताओं के स्मारकों पर रोक सिर्फ इसलिए लगाई गई, क्योंकि उनका ताल्लुक देश के दलितों से था।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://blog.bspindia.org/%e0%a4%95%e0%a4%a0%e0%a4%98%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ab-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b8/feed</wfw:commentRss>
		</item>
	</channel>
</rss>
